फूलो 

                                                                    (ब्रजभाषा कहानी संग्रह)

                      (उ.प्र.हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा वर्ष-2016 का श्रीधरपाठक नामित पुरस्कार प्राप्त )

                                                        डाॅ0 दिनेश पाठक ‘शशि’




                                                                   ISBN : 978-81-8111-343-6




                   © डाॅ0 दिनेश पाठक ‘शशि’
                    प्रथम संस्करण 2016

                    मूल्य         ः 150 रुपये
                    प्रकाशक गोविन्द पचैरी
                               जवाहर पुस्तकालय 
                               हिन्दी पुस्तक प्रकाशक एवं वितरक
                              सदर बाजार,मथुरा, उ.प्र.
                              मोबा-09897000951
                        शब्द सज्जा ए.डी.पी.कम्प्यूटर्स, हनुमान नगर,मथुरा
                        मुद्रक जय भारत प्रिंटिंग प्रेस,शाहदरा,दिल्ली-32

             FOOLO BRIJ BHASHA Stories) By: Dr. Dinesh Pathak 'Shashi    Rs. 150/-.    





आमुख-

डाॅ0 दिनेश पाठक ‘शशि’ एक जाने-माने बहुचर्चित साहित्यकार हैं। बे एक सनेह संचित साहित्यानुरागी, क्रियमान तथा हिन्दी खड़ी बोली और ब्रजभाषा दोऊन के सफल कहानीकार औरु रचनाकार हैं। डाॅ. दिनेश पाठक ‘शशि’ ने जितेक ख्याति खड़ी बोलीन की कहानीन के लेखन में अर्जित करी है, उतेक ही या यों कहौ कै बाते ज्यादा ही ख्याति ब्रजभाषा कहानीन के लेखन में करी है। इनके दो कथा संग्रह ब्रजभाषा-कहानीन के प्रकासित है चुके हैं और आगे हू निरन्तर लेखन में निरत हैं। 
डाॅ. पाठक की कहानीन में उनकी अपनी अलग पहचान है। निरन्तर सृजन में लगे रहिबे बारे डाॅ. पाठक जी की कहानीन में अपनौ प्राचीन भारतीय गाँमनु कौ परिवेस है, एक दूसरे के दुःख-दर्द की कराह और अपने समाज की आधार-भूमि के दर्सन होय हैं। लेखक कौ हृदय परपीड़ा अरु परिकगतिरता सों लबालब भर्यौ भयौ है। इनकी कहानीन के सीर्षकन के नाम उनन्नें बड़ी समझदारी औरु सोच समझि कें रक्खे हैं, जैसें - बिबाई, करम फलै तौ सब फलै, दूध कौ दूध-पानी कौ पानी, जैसी करनी, भाग कौ लेखौ, यक्ष-प्रस्न, चीरहरन, बीच कौ मारग, समै कौ चक्र, सोलह आना सच, समै की बलिहारी, औरु होरी कौ बैरु।’’ जा संग्रह की जि कुल अट्टारह कहानी हैं। इन कहानीन की कथा-वस्तु बड़ी सरल और मार्मिक हैं। काऊ कहानीयै उठायकैं पढि ़लेउ बाके मरम भरे वाक्यन सों घायल भये बिना आप नाँय रहि सकौगे। पहली ही कहानी ‘‘बिबाई’’ कूँ ही लै लेउ - जा में बाक्यन की बुनाबट देखौ- 
‘‘मोकूँ लगौ काका मेरी बात कौ जबाव टारिबौ चाहै, जाही तै जबाव दैवे की जगै मोते पूँछि रहे हैं, मैं समझि गयौ, काका के दिल में कहूँ कोई कसक पैदा ह्वै गई है, अपनी आदतन बु मोकूँ बात नाँय बतानौ चाहि रहे, मोकूँ ही का, काका अपने दुःख-दरद कूँ काहू कूँ ही नाँय बताऔ करें, जब कबहू हिये की पीड़ा बहौतु ज्यादा बढ़ि जाय है तौ एैसें ही गुम-सुम से आसमान की लंग कूँ निहारौ करैं हैं।’’ जाही तरियाँ जा संग्रह की एक औरु कहानी है- ‘‘जैसी करनी’’ बाके पीड़ा भरे वाक्यन कूँ देखौ-
‘‘काहू कें सन्तान नांय भई तौ बु दुःखी है। काहू के सन्तान है गई परि निकम्मी निकरि गई। काहू के पास गुजारे लायक हूँ पैसा टका नांय हतै तौ काहू कौ कोऊ नाते-रिस्तेदार असमै ही गुजरि गयौ। बस्स जाही तरियाँ के भौतु सारे दुःख जा धरती के प्राणीन के संग लगे भये हैं जिन्हें भोगत भये बु अपने-अपने मन में दुःखी हैबे करेैं हैं।’’
‘डाॅ. रंजना’ ‘भाग कौ लेखौ’ कहानी में हू कथाकार बाके दुःख दर्द में सिमिट कैं बैठ गयौ है। जि एक समाज सेविका नारी की व्यथा कथा है। बाके पति मदन कों विदेस में बौहौतु सारौ रुपिया मिल गयौ। बानें विदेस में सादी कर लीनी। रंजना अपार दुःख के सागर में डूबि गई। जा प्रकार सों एक के बाद एक कैऊ झटकान कूँ झेल्त भये रंजना भीतर ही भीतर टूटि गई। बु बाँके बिहारी की सरन पौहोंचि कें उन्ते बिन्ती करन लगी- ‘हे प्रभु! कब तलक जे विदेस गये मदन निरदोस भारतीय ललनान कूँ यूँ ही छलिबौ करिंगे?’
ऐसें ही जा संग्रह की औरु हू कहानी दुःख, पीड़ा और दर्द सों भरी हैं। करम फलै तो सबु फलै, भाग कौ लेखौ, यक्ष-प्रस्न, चीरहरन, बीच कौ मारग, समै चक्र, समै की बलिहारी और होरी कौ बैर जाई तरियाँ की पीड़ा और कसक भरी हैं। लेखक हू नें अपने जीवन में सदा ते करुणा-कातर समै बितायौ है। ये अनुभूति सौं भरी कहानी है। याही तें और अधिक मार्मिक और हृदय ग्राही है। 
मैं लेखक कौ हृदय ते आभारी हूँ जिनन्नैं मोकूँ एैसी सुरुचिपूरन औरु हृदयग्राही अपनी कहानीन कौ परिचय करायौ। इन श्रेष्ठ कहानीन के ताईं लेखक डाॅ. पाठक बधाई के पात्र हैं। कथावस्तु, लेखन, भाषा-शैली, सम्बाद आदि सिगरी दृष्टिन सों जि कहानी संग्रह सुन्दर बन पड़ौ है। लेखक कूँ एकबार फिर बधाई।
भवात्मिन्
उमाशंकर दीक्षित
सह-संपादक, ब्रजसंस्कृति विश्वकोश
वृन्दावन शोध संस्थान, वृन्दावन 





अपनी बात -

मानुष जीवन के सुरु हैबे के संगई सुख औरु दुःख, लाभ औरु हानि, जस औरु अपजस सब कछु जुड़िबौ सुरु है जाबै है औरु मानुष पूरे जीवन पग-पग पै इन सबनु के बीच पेण्डुलम की तरैं या ओर तें बा ओर झूलौ करै है। काहू की छोरी या छोरा कौ ब्याह नाँय है पाय रहौ तौ काहू कौ ब्याह तौ है गयौ परि घरबारी या घरबारौ नीकौ नाँय मिलौ। काहू के छोरा की घरबारी, अपने सासुरे मैं आयकें सासुरे बारेन कौ जीवौ हराम करि देय है तौ काहु की अपनी सेवा-सुश्रुषा तें अपने ससुर-सासुल की आशीषनु तें अपनी झोरी भरि लेय है।
काहू के छोरा की नौकरी नाँय लगि पाय रही तौ काहू कूँ नौकरी तौ मिली पर मनभावन नाँय मिली। काहू के छोरा या छोरी नाँय है पाय रहे तौ काहू के छोरी ही छोरीन नै जन्म लियौ। यानि कछु न कछु या जीवन में ऐसौ जुड़ि जाबै जातें मानुष पूरे जीवन काहू न काहू उरझन में उरझौ ही रहै।
इन सिगरी बातनु कूँ एक आम मानुष यांै ही भोगौ करै परि एक रचनाकार इन सिगरी बातनु कूँ भले ही नाँय भोगै परि दूसरे मानुषन कूँ भोगत भये हूँ देखि कें उद्द्वेलित होयौ करै। बाके मन में दूसरे के दुःख-दर्द, उत्तेक ही पीड़ा पौहचाबैं, जितैक बूँ खुदि भोगिकें पावतो। एक रचनाकार के हिय में छोटी तें छोटी बात हूँ बैसे ही उमड़ौ-घुमड़ौ करै जैसें तालाब के बीच में फैंकी भई एक कंकरी तें तालाब के किनारे तक लहरें आबैं हैं। ब्रज कथा संग्रह ‘‘फूलो’’ की कहानीन में हू तालाब में फैंकी भई एक कंकरी की लहरनु की अनुभूति और अनुभवन कौ परिपक्व रूप भरिबे कौ औरु जीवन की अनन्त घटनानु में तै कछुक कूँ मैंने जा संग्रह में समाहित करिकें, पाठकनु कूँ बिनतें रूबरू करिबै कौ एक छोटौ सो प्रयास करौ है।
जाकी कहानीनु कूँ पढ़िकें पाठकनु कूँ लगैगौ कें जाकी या कहानी कौ पात्र तौ हमारे ही पड़ोस में रहिबे बारौ.... दीना, रंजना, फूलो या फिर रामनाथ काका हैं। या फिर जाकी अमुक कहानी में तौ मेरे ही जीवन की कहानी लिखी भई है। यानि जा संग्रह की सिगरी कहानी हमारे आस-पास बिखरी परी घटनानु की ही कहानी हैं, कल्पना लोक की परीकथा या फिर वातानुकूलित रेस्तरां और काॅफी हाउसन में बैठिकें कल्पना की उड़ानें भरिबे बारी कहानी नाँय हैं।
जा संग्रह की कहानीनु के लिखिबे के समै, डाॅ. चन्द्र किशोर पाठक, डाॅ. ताराचंद शर्मा, डाॅ. प्रेमदत्त मिश्र मैथिल, डाॅ. अनिल गहलौत, डाॅ. हरीसिंह पाल, डाॅ. अलका पाठक, गोपाल प्रसाद मुद्गल, अंजीव अंजुम और मोहन स्वरूप भाटिया, एस. डी. पाठक, डाॅ. सोमदत्त शर्मा, मदन मोहन शर्मा ‘अरविन्द’, डाॅ. के. उमराव ‘विवेकनिधि’, नीरज शास्त्री आदि कौ और गत बारह बरस तें विवस मौन धारी पत्नी शशि, पुत्र आकाश-सागर और पुत्रवधु अनुपमा कौ हू काउ न काउ रूप में सहयोग रहौ है। जाके लैं मैं बिनकौ आभारी हूँ।
जा संग्रह कौ आमुख, ब्रजभाषा के विद्वान और ब्रज विश्वकोष वृन्दावन शोध सस्थान के सहसंपादक और जमुना जल पत्रिका के संपादक आदरणीय पं. उमाशंकर दीक्षित जी नें लिखिकें मोपै महती किरपा करी है। पुस्तक के प्रकासन कौ दायित्व अजय पुस्तक भण्डार के मालिक श्री अजय श्रोत्रिय जी ने निभायौ है जो मेरे लैं हर्षदायक है।
                                                                                    विनयावनत-
                                                                                                                    डाॅ. दिनेश पाठक ‘शशि’
                                                                                                                   28, सारंग विहार,
                                                                                                                            मथुरा-281006 
                                                                                                                   मोबाइल- 9412727361, 
                                                                                                        E-mail: drdinesh57@gmail.com, 
                                                                          Blog: www.drdineshpathakshashi.blogspot.com









समर्पण
जाने-अनजाने में भये 
सबई अपराधन के लएँ 
क्षमायाचना सहित 
‘‘माँ’’ 
श्रीमती चम्पा देवी 
के 
चरननु में सादर समर्पित






अनुक्रम

1. बिबाई                                             13
2. दूध कौ दूध, पानी कौ......                     18
3. करमुफलै तौ सबु फलै......                  23
4. जैसी करनी                                     28
5. भाग कौ लेखौ                                     34
6. यक्ष-प्रस्न                                             39
7. चीरहरन                                             44
8. बीच कौ मारग                                     49
9. समै कौ चक्र                                     55
10. सोलह आना सच                             61
11. समै की बलिहारी                             66
12. होरी कौ बैर                                     71
13. छुटकारौ                                             76
14. फूलो                                             80
15. समाज कौ कोढ़                                     84
16. जहाज कौ पंछी                                     90
17. विधिना कौ लेखो                             95
18. अब पछताये होत का?                    100
19. आब नहीं आदर नहीं                            105






बिबाई

सन्ध्या-बंदन करिबे के बाद मैं मंदिर तें निकसि कें अपने घर की लंग कूँ जाय ही रह्यौ हतो कै अचानचक ही रामहरि काका पै नजरि परि गई। बू, दूधिया रोसनी में जगमगाय रहे अपने घर के बरामदे में परे सुन्दर सोफासैट पै बैठे भये हे।
रामा-किसना करिबे के बाद मैं अपने कूँ रोकि नाँय सकौ औरु रामहरि काका तें पूछि बैठौ- ‘‘चैं काका, कहा बात है? ऐसें कैसे बैठे हौ चुप्पचाप से, काहू बात की कोऊ तकलीफ है का?’’
मेरी बात कूं सुनिकैं काका पहलें तौ सोफासैट तैं उठि खड़े भये फिरि मेरौ हाथ पकरिकें मोकूं अपने सोफासैट पै बैठावत भये खुदि हू बैठि गये और मेरी लंग कूं देखत भये बोले- ‘‘औरु सुना गिरधारी, बाल-बच्चे मौज में तौ हतैं ?’’
मोकूँ लगौ काका मेरी बात कौ जबाबु टारिबौ चाहैं, याही तैं जबाबु दैबे की जगै मोसें पूंछि रहे हैं, मैं समझि गयौ, काका के दिल मैं कहूँ कोई कसक पैदा ह्वै गई है औरु अपनी अदातन बूँ मौकूं बात नाँय बतानौ चाहि रहे, मौकूं ही का, काका अपने दुःख-दरद कूँ काहू कूँ ही नाँय बताऔ करें, । जब कबहू हिय की पीड़ा भौतु ज्यादा बड़ि जाय है तौ एैसें ही गुमसुम से आसमान की लंग कूं निहारौ करैं हैं। 
मैंनें काका की आँखिन में देखत भये निहोरौ करौ- ‘‘चैं काका जि मेरी बात कौ तौ जबाबु नाँय भयौ, पहलें मैंनें तिहारी राजी-खुसी पूछी हती तौ पहलें आपु ही अपनी राजी-खुसी मोय बताऔ फिरि मैं बताऊंगौ।
मेरी बात सुनिकें काका की अँंखिन में पीड़ा की रेखा औरु गहरी है गई। बूँ मेरी लंग कूँ देखन लगे- 
‘‘नाँय गिरधारी काहू बात की कोऊ तकलीफ नाँय है भैया, सब ठीक-ठाक है, तू सुनाय अपनी, कैसी कटि रही है?’’
काका के जबाबु तें मोकूं अबऊ तसल्ली सी नांँय भई।
कैऊ बरस पैहलें जब काका नें जा मौहल्ला में अपनौ जे मकानु बनवायौ हतो तौ सारे लोग-लुगाई देखि-देखिकैं अचरजुसौ करिबे लगे हे-
‘‘कैसौ मकानु बनाय रहे हैं काका’’
‘‘का पूरौ राजमहल बनवाय कें दिंगे अपने छोरानु कूँ’’
‘‘अरे, नौकरी-चाकरी बारे हैं, भौतु सारौ रुपैया मिलौ होयगौ, तौ लगाविंगे ही।’’
चार मुँह चार बात, पूरे मौहल्ला में काका के मकान की चरचा। कछु लोग तौ काका तें ईरषा भाव हू रखिवे लगे, बस्सि याही बात तैं कें काका नें अपनौ मकानु हमाये तें इत्तौ अच्छौ चैं बनवाय लयौ।
परि जब मकान बनि कें पूरौ है गयौ औरु काका अपने घर-परिवार के संग बामैं रहिबे लगे तौ बिनकौ व्यवहारु देखि-देखि कें सारे मुहल्ला बारे अपने आपु ही सान्त है गये अपने मन में ईरषा भाव रखिबे बारे हू अब काका, काकी औरु उनके बालकनु के व्यवहार कूं देखि कें उन्ते प्रेमु करिबे लगे।
पूरे मौहल्ला में कबऊ काहूँ कूं काऊ चीज की जरूरत परि जाय, काका तुरन्त पहुँचवाय दैबें हैं। काऊ घर में कोऊ हारी-बीमारी होय, काका पैसा टका तें ही नाँय, डाक्टर कूँ बुलबायबे तक कौ इंतजाम खुदि ही करि दैवें हैं, काहूँ के घर में खाइबे कूँ अन्न नाँय, काका 20-50 सेर गेहूँ बाके घर डलवाय दैवें हैं फिरि ऐसे देवता आदमी कौ भला कौनु प्रतिद्वन्द्वी होयगौ। याही तैं काका कूँ गुमसुम देखिकें मेरे मन में हूँ पीड़ा सी भई औरु मैं जिद करि बैठों-
‘‘नाँय काका, आज जरूर ही कछु बात है, नांही तौ आपुकँू कबऊ ऐसे सुस्त नाँय देखौ मैंने। मौंकूँ नाँय बताऔगे काका? या मोकूँ जा लायक नाँय समझौं? लगूं ही का हूँ जो मोहि कछु पूछिबे लगौ तौ काका ने मेरी बाँह पकरि कैं फिरि तैं बैठाय लियौ औरु मेरे म्हौंडे़ की लंग कूँ देखिबे लगे- 
‘देखि गिरधारी, ऐसी दिल दुखायबे बारी बात मति कहि भैया। तौकूँ पूछिबे कौ पूरौ अधिकारु है, परि बात जे है भैया कै ऐसी कोऊ बात ही नाँय है जाकूँ मैं तोहि बताऊं। अब देखि, जा ऊपर बारे की बड़ी ही विचित्र लीला है, आदमी सौचें कछु औरु है औरु घटि कछु औरु ही जाबै है।’
‘हाँ सो तौ है काका, परि जा में इत्तौ दुःखी हैबे बारी तौ कोऊ बात नाँय है, सोे तौ सारी दुनिया के संग है काका, कै हम सोचत कछु औरु-औरु हैं औरु ऊपर बारों कछु औरु ही करौ करै है।’
बस्स तौ मैं हूँ बा, ऊपर बारे की लीला कूँ देखिकैैं, औरु अपने बीेते दिनानु कूं यादि करि-करि कें, विचारनु में डूबौ भयौ हो गिरधारी। बु एक कहावत है ना, कैं सबकूँ अपनी-अपनी सलीबन पै ही लटकनौं परै है यानि अपनौ दुःख-दरद तौ खुदि ही भौगनौ परै है, कोऊ बांटि नाँय सकै, तौ भैया, फिरि जा मैं दुःखी है बे बारी सच्चमुच्च ही कोऊ बात नाँय है।’’ 
कहत-कहत काका की दोनों आँखिन की कोरनु तें एक-एक बूंद बरबस ही चू परी तौ मैं हूँ द्रवित है उठौ। ‘‘काका तिहारौ कहौ सबु सही है परि फिरि हूँ मौय ऐसौ लगि रह्यौ है कै आपु मोतें कछु छुपाय रहे हौ, नांही तौं तिहारी दोनों आँखिन तें जे आँसू......
काका नें मेरे कंधा पैं अपनौ हाथ धरि दियौ- ‘‘देखि गिरधारी, तू तौ जा घर में सुरूतें ही आबत-जात रहौ है, या कहूँ कै हमारे घर-परिवार की सब बातनु कूँ जानें है, मैंनें जे घरु का अपने लैं बनवायौ हतो? कें सेवानिवृति के बाद दोऊ बुड्ढा-बुढ़ियाँ रहिंगे जामें? अरे, अपने गाम में जाय कें रहते, अपने बन्धु-बान्धबनु के बीच, पुस्तैनी मकान में, औरु अपनी जनम-भूमि की रज में, खेत-खलिहाननु में लोट लगातौ। बाही जगह जहाँ जनम लियौ, खायौ-पीऔ और गली-मुहल्लन में खूब घूमौं करतौ। जा मकान कूँ बनवायबे में इत्तौ पैसा-टका खरचिबे की मौकूँ कहा जरूरत हती।’’
‘‘हाँ सो तौ है काका, एक-द्वै बार तौ मैं हूँ गयौ हूँ तिहारे संग, तिहारे गाम कूँ। खूब खेती-बारी है। भौतु आनन्द आयौ हतो कोल्हू पैं ताजों-ताजों गन्ना कौ रसु पीवे में औरु गरम-गरम गुड़ खायबे में। तिहारौ तौ गाम में हूँ इत्तौ बड़ौ घरु है कें, रहिबे बारेनु की कमी पड़ी रहै है।’’- काका के गाम की याद नैं मोकूँ काका की पारिवारिक सम्पन्नता की याद दिलाय दई। गांम के बीचों-बीच भव्य भवन बड़ों सों बाग-बगीचा, खूब लहलहाती गेहूँ की फसल औरु ढोर-डंगर।
नौकरी तें सेवानिवृत्ति के बाद काका कूँ जि मकान बनबायबे की कतई जरूरत नाँय हती। परि काका नें जि मकान चैं बनवायौ हतो, जाके पीछें काका की मजबूरी ही, बिनकौ सोचिबौ हो कें तीनों बच्चानु में, कोऊ ना तों गाम में पैदा भयौ, ना पढ़ौ-लिखौ औरु ना रहौ ही, फिरि जे कैसें रहिंगे गाम में। छोरी तौ खैरि व्याह के बाद अपई ससुराल चली जावेंगी, परि दोनों छोरा.... जे तौं चार दिना हूँ गाम में नाँय रहि सकिंगे। याही तें जा मकान में इत्तौ पैसा लगायों हो। काका कौ सपनौ हो कें सबु मिल-जुल कें संग-संग रहिंगे। परि दोनों बेटानु नें पढ़ाई-लिखाई पूरी करत ही दूर-सहर में अपनी-अपनी नौकरी लगाय लई औरु तौ औरु अपनी बहुरियानु कूँ संग ही लें गये। रहि गये दोऊ बुड्ढे-बुढ़िया, इत्ते लम्बे-चैड़े घर में अकेले रहिबे कूँ। सायद जि पीड़ा काका के दिल में उमड़ि परी है। मैंने काका कूँ सांत्वना दई-
‘‘काका, दुःखी मति होऔ, जि तौ दुनिया कौ दस्तूर है, फिरि आजु के बालक तौ अपनी मर्जी के मालिक हैं, कोऊ माँ-बाप के संग नाँय रहिबौ चाहै, बु तौ माँ-बाप की ही आत्मा है जु दुनिया के सारे सुख अपनी संतानन कूँ जुटाय कें दै दैनों चाहें हैं।’’
हाँ जि तौ तू ठीक कहि रहौ है गिरधारी, परि भैया, जि मानव मन बड़ौ विचित्र है, जि पंछी तो है नाँय कें पंख निकरत ही बच्चा फुर्र तें उड़ि चले, सब मोह-ममता खतम। जि तौ अपने बच्चनु की फलरियानु में गू-मूंत साफ करिबे तें लैंके, घुटुरून घिसटिबे औरु पैया-पैया चलिबे तक के मनोहारी दृस्यनु कूँ अपने मन-प्राण और स्मृतिनु में समाये भये रहैं हैं। बच्चानु के पढ़ायबे-लिखाइबे और लालन-पालन के सारे कष्ट सहे हैं, सब कछु करतव्य मानिकें। तौ भैया जि माँ-बाप कौ हिया नाँय मानें औरु मैं तौ अब तक अपने कूँ भौतु पाषाण बनाय चुकौ हूँ परि जब तें तेरी काकी कौ स्वास्थ्य गड़बड़ भयौ है, सच मानि गिरधारी जा इत्ते बड़े घर में, मैं अकेलों परि गयौ हूँ। तेरी काकी म्होंडे़ तैं तों कछु नाँय कहै परि घर की सूनी-सूनी छत्तिनु और बच्चनु के चित्रनु कूं देखि-देखिकें जब अपनी आँखिन कूँ गीलों करि लेय है तौ मैं अपनी रुबाई नाँय रोकि पाऊँ हूँ, बस्स औरु कोऊ बात नाँय है भैया जो तोसूँ छुपाय रहौ होऊँ।’’
काका की बात नें मोकूं निरुत्तर सों करि दियौ। काका की पीड़ा की गहनता कूं तौ भुगत भोगी ही महसूस करि सकें है।


ि

दूध कौ दूध, पानी कौ....

‘‘का बात है काका, आजु तौ भौत उदास से लगि रहे हौ?’’- सन्ध्या बन्दन करिकैं लौटत भये, रस्ता में अपने घर के सामने बने चैंतरा पै चारपाई डारिकैं सुस्त से बैढ़े रमन काका कूँ देखिकैं मैं रुकि गयौ। 
मेरी बात सुनिकैं काका जैसैं सपने तैं जागे हौंय, चैंकत भये बोले- ‘‘अरे रेवती, कहाँ तें आय रहौ है भैया? बैठि, बाय मूँड़ा कूँ खैंचि लै नैंक।’’
काका आय तौ रहौ हूं मंदिर तैं, संध्या बन्दनु करिकैं परि आपकूँ या तरियाँ उदास देखिकैं रुक गयौ हूँ। का कोऊ विसेष बात है गई है काका?’’ - मूड़ा कूँ पास खैंचिकैं बापै बैठत भये मैंनें पूछी।
‘‘नाँय बिसेष बात तौ कछू नाँय भई, रेवती। मैं ऊपर बारे की लीलानु कौ सुमिरन करिकैं सोच में डूबौ भयौ हो। बाकी लीलान कौ कोऊ पारावार नाँय है भैया कैसौ दूध कौ दूध और पानी कौ पानी करि दैबें है बु।’’ 
‘सो तौ तुम ठीक कह रहे हौ काका, बाके ह्याँ देर है सकै परि अंधेर नैकऊ नाँय।’’
सोई तौ। अब भानू के घर कौ किस्सा ई देखौ, ऊपर बारे नें याही जनम में सबके देखत भये, करनी कौ फलु सामनें लाय दयौ।’’- काका नें अपने भीतर उमड़ि-घुमड़ि रहे बिचारनु कूं बाहर निकारिबौ चाहौ, याही तैं भानू की चरचा करिकें मेरे म्हौंडे़ की लंग कूं देखिबे लगे।
मैंने काका कूं उकसायों, ‘‘हाँ काका, कहा किस्सा है भानू कौ? मैंनेें नाँय सुनौ। नैंक मोकूं हू सुनाऔ तौ। कहा भयौ भानू के संग?’’
‘भयौ का, याही जनम में सबु सामनें आय गई। अपने मैया-बापू के संग भानू नें जो करौ हतो, बा के बारे में तौ तोय कछू पतौ नाँय होयगी रेबती, परि अब भानू के छोरा-छोरी भानू के ंसंग जो करि रहे हैं, बा की जानकारी तौ तोय होयगी ही?’’- हुक्का की नैंच मेरी लंग कूं बढ़ाबत भये काका ने मेरे म्हौंडे की लंग कूं निहारौ। 
‘‘काका मैं ठहरौ बाहर ही बाहर रहिबै बारौ, गाम मौहल्ला के बारे में तौ कबऊ तिहारे ढिंग हूं आऊं तबई पतौ चलै है।’’
‘हाँ सो तौ तू ठीक कह रह्यौ है रेवती। तू ठहरौ अपने काम तैं काम रखिबे बारौ मानुष। दुनियादारी के झंझटनु तें तोय कहा मतलबु। परि भैया, मैं तौ य्हाँ गाम में ही रहूं  हूं, बारह महीना तीसौ दिन। कहूँ न कहूँ तें हवा में उड़त भई गाम भरे की बुरे‘-भले की सब बातें मों तक पौंचि ही जाबैं हैं। 
‘ठीक कह रहे हौ काका, परि जे भानू कौ कहा किस्सा है? ठीक समझौ तौ नैक संछेप में मोकूं हूं बताय देउ।’’
‘ठाकुर महीपाल सिंह गाम की जानी-मानी हस्ती हते। ऊपर बारे की किरपा तें घर में धन दौलत की कतई कमी नाँय हती’ - काका नें द्वै-तीन बार हुक्का कूं गुड़गुड़ात भये नैंच मेरी लग कुं बढ़ाय दई-
‘परि ठाकुर महीपाल कूं अपने धन-दौलत कौ कतई गुमान नाँय हो। सब कछु होत भये हूं बुं ऊपर बारे के ध्यान में लीन रह्यौ करै हे। द्वै छोरा और द्वै ही छोरी महीपाल के पास हते। कोऊ 10-12 बरस के बाद ऊपर बारे नें तीसरौ छोरा और दै दयौ। समै बीतिबे के संगई धीरे- धीरे करिकें ठाकुर महीपाल नें सिगरे छोरा-छोरीनु कौ ब्याहु करि दयौ।’’- काका नें इत्तौ कहि कें मेरे म्हौंडे की लंग कुं देखौ और मेरे हाथ तें हुक्का लैंकें द्वै-तीन बार गुड़गुड़ायौ और फिरि हुक्का मेरी लंग कुं करि दियौ। मैंने बात कौ तारतम्य जोड़िबे के लैं काका के हाथ तें हुक्का लै लयौ-
‘फिरि का भयौ काका? फिरि तौ ठाकुर महीपाल नें घर के सारे कामनु तें अपने आपु कूं पूरी तरियाँ मुक्त करि लयौ होयगौ? खेती-बारी औरु घर-गिरस्ती के सिगरे कामनु कूं करिबे के लैं छोरा और बिनकी घरबारी जो आय गये हते।’
‘हाँ तू ठीक कह रहौ है, महीपाल तौ पहलंे तें ही घर-गिरस्ती में रहत भये हूं संसार तें बिरक्त सौ रहै हो, अब और मुक्त है गयौ सब झंझटनु तें। परि कछु समै बाद महीपाल के छोरा और बिनकी घरबारीनु में घर के काम-काज कूं लैकें हाय तौबा मचिबे लगी। बड़े छोरा भानू कूं लगै कैं बु औरु वा की घरबारी ही सबतें जादा काम करै हैं। मझलो और छुटका तौ मौज करि रहे हैं। ऐसौई मझले और छोटे कूं लगन लगौ। जा तरियाँ तीनों भाइनु में आपस में तनातनी सी है गई और बिनके झगड़ेनु में चोट परी महीपाल पै। तीनों छोरानु की कलहबाजी देखि-देखि कें महीपाल की आत्मा में कष्ट हैबे लगौ। छोरानु कूं समझाइबे कौ जतनु करौ तौ परिणाम जै निकरौ कें तीनों छोरानु नें अपनें मैया-बापू की सेवा टहल और द्वै बखत की रोटीनु कौ हू आपस में समै औरु नम्बर बांधि लयौ। जिन मैया-बापू ने पाँच-पाँच छोरा-छोरीनु कूं अकेले ही पालौ-पोसौ हो बिनकी देख-भाल तीन-तीन छोरानु कूं भारी लगिबे लगी।’
इत्ती बात कहि कें काका चुप्प है गये। अपनी आँखि मूंदि के दोऊ हाथ जोरि दये जैसे कहि रहे होंय कै ऊपर बारे तेरी हू अजब लीला है।
काका की बातनु कूं सुनिकें मेरौ हूं मन भावुक है उठौ। एक लम्बी सी सांस लेत भये मैंने काका के म्हौड़े की लंग कूं निहारौ-
‘‘काका जे हाल तौ अब सबई घरनु कौ है गयौ है। मंहगाई की मार नें और अति भौतिकता की दौड़ नें मानुष कूं ऐसौ करि दयौ है कै बाय अपनी घरबारी और छोरा-छोरीनु के सिबा कछू हूं नाँय दिखाई दै रह्यौ। आजु हर कोऊ अपने छोरा-छोरीनु कूं एकदम तें कलट्टर बनाय दैनौ चाहै है, याही लैं बू अच्छे तें अच्छे स्कूलनु में दाखिला तौ कराय दैबै है परि बिनकी फीस जुटायबे में ही बा की कमर टूटि जाबै है।’’
जे तौ तू ठीक कह रहौ है भैया, परि सबरौ बोझ इकले मैया-बापू की अवहेलना करिबे ते ही कम है जाबैगौ का? जिन मैया-बापू नें पैदा करौ पालि-पोसि कें बड़ौ करौ। सारे दुखनु कूं झेलत भये अपने छोरा-छोरीनु कूं सुखी राखौ, बूं ही मैया-बापू बोझा बनि गये। जैसी रूखी-सूखी घर में बनें बाही कूं आदर-सम्मान के संग मैया-बापू कौ पहलौ हक समझि के बिनकूं जिमाऔ तौ बिनकी आत्मा कित्तौ सुख मानें। परि नाँय मैया-बाप कूं अलग करि दैबे तें ही घर कौ सारों खरच बचि जाबैगौ, भलै ही दुःखी मैया-बापू की आत्मा की आह तें सब स्वाहा है जाबै।’
‘जे तौ ठीक कह रहे हों काका। महीपाल के छोरानु ने फिर कहा करौ बिनके संग?’
‘करौ का, तीनों छोरानु नें मैया-बापू कूं आपस में बाँटि लियौ। एक माह बापू बड़े के पास तौ मैया मझले के घर। दूसरे माह बापू मझले के पास तौ मैया छोटे के घर। याही तरिया समै बीति रहौ हो, छुटका के घर एक बार मैया बीमार परि गई। बापू ने सुनी तौ मझले कूं कही कें भैया मोय छुटका के घर पहुँचा आ।
मझलौं कैऊ दिना तक आजु-कल्लि, आजु-कल्लि करिबौ करौ तौ महीपाल के धीरज कौ बाँध टूटि गयौ और बू मझले के घर तें निकरि परौ। काहू तरियाँ छुटका के घर पहुँचै तौ छुटका की घरबारी नें अपने छोरा कूं चाय कौ लोटा थमात भये अहसान सौ जतायौ- ‘‘लै जाय के अपने बाबा कूं दै आ जि चाय, य्हाँ एक के इलाज के लैं ई पैसा टका नाँय है ऊपर तें जे और आय गये। इनकी तीमारदारी कौन करैगौ अब।’’
महीपाल ने जि बात सुनी तौ झैर कौ घूंट पी कें रह गयें चाय कौ लोटा वापस करि दयौ और अपनी घरबारी कूं सहारौ दैकें छुटका के घर तैं निकरि परे।
‘‘ऐसी हालत में घर तें निकरि परे, फिर बू कहाँ गये काका?’
‘गये कहाँ, कहावत है न कें जाकौ जग में कोऊ नाँय होबै बा कौ ऊपर बारौ होबै है। ठाकुर महीपाल सीधौ-सच्चै मानुष हो सो अपनी घरबारी कूं संग लैं के पहुँचि गये गिर्राज जी महाराज की सरन में। सब कछु बिनके ही ऊपर छोड़ि-छाड़ि कें। अपने छोरानु कूं और बिनकी घरबारीनु कूं हू कोऊ बददुआ नाँयदई। बस गिर्राज जी महाराज के चरननु में दोऊ नें अपने आपु कूं समर्पित करि दियौ। पर गिर्राज बाबा तौ सब कछु जानें हैं।
जैसौ ब्यौहार बिनने अपने मैया-बापू के संग करौ हो बैसौ ही बिनके छोरा करन लगे। हौनी की बात, भानू की तबियत अचानक ही खराब है गई। डाकटर बैदनु कूं दिखायौ परि कौऊ फरक ही नाँय परौ। दिन पै दिन तबियत में सुधार है बे की जगै भानू चारपाई तै लगि गयौ। कछु दिना तलक तौ भानू के बड़े छोरा, ओमी ने भानू कूं अपने घर पै राखौ परि फिरि एक दिना ओमी, भानू कूं छुटका दामू के घर पै छोड़ि आयौ।
संझा कूं जब दामू अपनी डूटी करिकें लौटौ और बानें देखौ कें बापू तौ ओमी के ह्याँ हे फिरि ह्याँ कैसें आय गये? अबई तौ बाकौ नम्बर नाँय आयौ बापू कूं अपने ढिंग रखिबे कौ फिर ओमी ह्याँ चैं छोड़ि गयौ। 
दामू ने आब देखौ न ताव, अपने बापू कूं गोद में उठायौ और ओमी के घर छोड़ि आयौ।भानू गठरिया सौ बनौं खुली आँखिनु तें निरीहता तें देखिबौ करौ। वा में इत्ती सी हूं ताकत नाँयबची ही कैं अपने आपु खड़ौ हू है सकै।
ओमी नें जब देखौ कें दामू, बापू कूं ह्याँ छोड़ि गयौ है तौ दामू और ओमी में आपस में खूब घमासान है गयौ। भानू चेतना सून्य सौ सब कछु देखिबौ करौ। बीमारी के कारन बु तौ कछु बोलि हूं नाँयपाय रहौ हो। परि जा रस्सा-कसी में बा कूं अपनी जवानी कौ बूं समै यादि आय गयौ जब वा नें हूं जबानी के जोस में अपने मैया-बापू के संग ऐसौ ब्यौहार करौ हतो। भानू की आँखिनु तें नीर बहिवे लगौ। परि तब पछतायबे तें कहा होय जब चिड़िया चुगि जायं खेत। अपनी-अपनी करनी कौ फलु तौ भोगनौ ही परै है सबकूं। समैं बीतिबे के बाद फिरि नाँय लौटौ करै। जे ही ऊपर बारे कौ बिधान है।

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करमुफलै तौ सबु फलै...

सन्ध्या बन्दन करिकें काका, मंदिर तें घर की लंगकूँ चलिबे लगे तौ मारग में अचानचक ही बिनकी नजरि अपने घर के दरबज्जे पै सुस्त से बैठे, सुखना पै परि गई।
‘अरे सुखना, कहा बात है भैया? तेरे म्होंड़े पै जे बारह से चैं बजि रहे हैं? का कछु मुसीबत में है।’’
अपने मैई डूबौं सुखना अचानचक ई काका की बोली सुनिकें हड़बड़ाय उठौ। फिरि अपने आपु कूँ सहेजत भयौ मूंड़ा तें उठि बैठो, - ‘पांय लागूं काका, बड़े भाग हमारे, जु काका के दरस पाये। बैठौ काका।’ - सुखना नें मूंड़ा खिसकायौ।
‘‘बैठिबे कौ तौ समै नाँय है सुखना। मैं तौ मंदिर तें सन्ध्याबन्दन करिकें आय रह्यौ हो, परि तेरे कुमिलाहे से म्हौंड़े कूँ देखि कें, मेरे डग अपने आपु ही रूकि गये हते सो तोसूं पूछि बैठों हूँ। कहा बात है?’’
घावन पै मरहमु सौ लगाइबे बारी काका की बानी सुनिकें सुखना नें काका के म्होंड़े कूँ देखौ- ‘नाँय, ऐसी तौ कोऊ बात नाँय है काका, आपुकूँ बैसेई लगौ होयगौ।’
कहत-कहत ही सुखना की आँखिन की कोर भीगि उठीं और गरौ रुंधि गयौ तौ बानें अपनौ म्होंड़ौ दूसरी लंग कूँ फेरि लयौ।
‘कोऊ बात नाँय है तौ फिरि बताबत में तेरी आँखिनु तें जि बादर से काहे कूँ घुमड़ि आये? ऐं! अरे नैक मैऊ तौ सुनूं कौन सी मुसीबत नें आय घेरौ है तोकूँ?’’
काका के मिसरी से मीठे बोल सुनिकें सुखना पिघलि गयौ। दोऊ हाथ पकरि कें बानें काका कूँ मूंड़ा पै बैठाय दियौ औरु खुदि हू एक मुड़िया सरकाय कें बैठि गयौ।
‘‘अब आपुतें कहा छुपाऊं काका बात जि है कैं भौतु दिना है गये, घर में कोऊ न कोऊ संकटु बनौ ही रहै है।’’
‘‘कौन-सी मुसीबत की बात करि रहौ है तू, नैंक खोलि कें बता, मैं कछु समझौ नाँय।’’
‘अब कहा बताऊँ काका, आपु कूँ तौ मालुम ही है कैं कैऊ बरस तें चली आय रही घरवारी की बीमारी नें मोकूं भीतर ई भीतर तोरि डारौ है। ढेर सारौ पैसा दवाइनु में ई चलौ जाबै है, ऊपर तें आमदनी कौ कोऊ मुस्तकिल जरिया हूं नाँय हतै।’
‘जि तौ तू ठीक कहि रहौ है भैया, अब तेरी सरकारी नौकरी तौ है नाँय, कें कैसौऊ मौसम होय, महीना भर की पगार तौ समै पैं मिलि ही जावैगी। खेतीबारी में तौ औरु हूं भौतेरी मुसीबतें आय खड़ी होवैं हैं, कबऊ घनी बरसा तौ कबऊ घनौ सूखौ औरु कछु नाँय तौ कबऊ-कबऊ तौ मूसे औरु तोता ही फसलन कूँ बरबाद करि देबै हंै। 
‘जेईऽतौ, अब आपु ही बताऔ काका, पैसा काहू पेड़ पै तौ लगै नाँय है जु डार हिलावत ई चुइ परिंगे।’
‘‘हाँ, सो तौ तू ठीक कह रहौ है सुखना। परि तेरौ छोरा विनीत हू तौ पढ़ि-लिखिकें कछु नौकरी-चाकरी पै लगि गयौ होइगौ अब। बु कछु सहारौ नाँय देबौ बारौ का?’’
विनीत कौ नामु सुनत ही सुखना नें एक लम्बी उसांस भरी- ‘‘बस्स जाई बात कौ तौ रोइबो है काका। आज-कल्लि के छोरा बड़े-बूढ़ेनु की बात कूँ तौ गुजरे जमाने की बात कहिकें, एक कान तें सुनें, दूसरे तें निकारि दैबें हैं। अपनी गांठि कौ कछु अनुभव तौ बिनें होबै नाँय है। औरु कोऊ अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवनु कूँ बताइवौ चाहै तौ बू ऐसे भिनभिनाय जाबै हैं जैसें ततैया के छत्ता में हाथु डारि दयौ होय।’’
हाँ, सो तौ तू ठीक कहि रहौ है सुखना, परि तेरौ बिन्नी तौ ऐसौ नाँय है, मैं जानूं नाँय हूँ का वाय। बूँ आजु कल्लि का करि रहौ है?
‘करि का रहौ है काका, पढ़ि-लिखिबे के बाद बाकूँ छोटी-मोटी कोऊ नौकरी तौ जँचै ही नाँय है औरु एक दम तें लाट साहिबी मिलै नाँय है। त्रिसंकु की सी हालत है गई है नई पीढ़ी की। रोज-रोज जाबै है परि सब जगैनु तें निरास लौटि आबै है। जानें कहा लिखि दयौ है वा के ललाट में विधना नें।’ -कहिकें किसना ऊपर आसमान कूं देखिबे लगौ।
बड़ौ छोरा, बाप कौ दायौं हाथु होबै है। बूं ही कछु सहारौ नाँय देबैगो तौ एक हाथु तौ बैसेई टूटि गयौ समझौ।’
‘अब कहा बताऊँ आपुकूँ काका, एक दिना पास बैठ कें मैंने समझायौ हतो कैं कोऊ बड़ी सी नौकरी चाकरी नाँय मिलि रही तौ कछु दिना छोटी-मोटी सी ही करिकें देखिलै भैया।’
‘‘हाँ, ठीक ही तौ कही तुमनें। फिरि कहा भयौ?’’
‘भयौ का काका, जा ऊपर बारे की हू अजब ही लीला है। मानस सोचै कछु और है, होबै कछु और ही है। विनीत नें कामु तौ पकरौ, परि बूँ जा नये जमाने के संग नाँय चलि पायौ।
‘‘चैं, जमाने के संग चैं नाँय चलि पायौ सुखना?’’
‘‘अब कहा बताऊँ आपुकूँ काका, ऐसों कलजुग आय गयौ है कै पैसा कमायबे कूँ एक तें एक चालाकी करि रहौ है मानुष। बिन्नी नें एक अखबार में देखिकें एक कर्जु दैबे बारी कम्पनी में जाइबो सुरू करौ हो। घरु बनायबे कूं करजौ, कछु सबारी-गाड़ी खरीदबे कूं करजौ। कछु दिना विनीत की मेहनत औ ईमानदारी देखिकें कम्पनी बारे नें विनीत तें कही कें अपने जैसेई मेहनती औरु ईमानदार कछु छोरानु कूँ और लाय देऊ तौ मैं बिनकूँ हू अपई जा कम्पनी में नौकरी दै दुंगौ, परि बिनकँू पचास-पचास हजार रुपैया पहलें जमा कराने परैगें। जब बूँ ह्याँ तें छोड़िबौ चाहिंगे तौ बिनके रुपैया वापस करि दये जामिंगे।’
‘‘फिर का भयौ सुखना? फिरि विनीत ने लगवाई कछु छौरानु की नौकरी?’’
बु ही तौ बताय रहौ हूँ काका। कम्पनी बारे की बात सुनिकें विनीत ने अपने जानिबे बारे औ रिस्तेदारी के 3-4 छोरानु कूँ लगवाय दयौ।’’
‘‘जि तौ भौतु नेकी कौ कामु करौ विनीत नें। बेरोजगारी के जमाने में काहू कूँ सहारौ दैबों तौं भौतुई पुन्य कौ कामु है।’’
‘नेकी कौ तौ है काका, परि जमानों तौ नेकी को नाँय है न। कोऊ द्वै लाख रुपैया चारों छोरानु के जमा है गये परि आजु कल्लि, आजु-कल्लि करत भये 10-15 दिना गुजरि गये, कम्पनी बारे नें बिनकूँ नौकरी पै नायं बुलायौ। रोज-रोज कछू न कछू बहानै बनायौ करै। कबऊ कहै कें कम्पनी कौ प्रबन्धक छुट्टी गयौ है, वा कूँ आय जान देउ। कबऊ कछु कहै औ कबऊ कछु। या तरियाँ चारौ छोरा वा की बातनु तें खूब ई झींकि उठे। अब बूँ विनीत तें कहिबे लगे कैं भैया तू तौ हमारे रुपैया वापस कराय दै। हमें नाँय करनौ जा के यहाँ कामु।’
बस्स काका, अब कहा बताऊँ आपुकूँ, जा बात तें बिन्नी अन्दर ही अन्दर घुरिबे लगौ। एक दिना मैंने अपये ढिंग बैठाय कैं धीरे तें कारनु पूछौ तौ विनीत की बातें सुनिकें मोय लगौ कैं कम्पनी बारो जरूर ही कछु गड़बड़ी करि रहौ है। है सकै वा कौ सबु कारोबार जालसाजी की नीम पैई चलि रहौ होय।
काका, मैंने बिन्नी कूँ तौ तसल्ली दै दई औरु दूसरे दिना बिन्नी के संग कम्पनी बारे के ढिंग जाइबे कौ तय करौ। तबई सबु असलियत पतौ चलैगौ।
भोर होतई मैं झटपट तैयार है गयौ और बिन्नी के संग चलि दयौ।’
‘‘अच्छौ कियौ तुमनें। फिरि कहा भयौ। कम्पनी बारौ का बोलौ?’’ - काका ने सुखना के म्हौंडे की लंग कूँ देखत भये पूछी।
‘अब कहा बताऊं आपुकूँ काका, व्हाँ जायकें देखौ तौ हम दोऊ तौ सकते में आय गये, कल्लि तलक ह्याँ ढेर सारे कम्पनी के बोर्ड लगि रहे हते औरु आजु.... दूरि-दूरि तकऊ कम्पनी कौ कोऊ नामु-निसानु हूँ नजरि नाँय आय रहौ हो, काका। पास-परोसिनु तें पूछी, परि काहू नें कछु नाँय बतायौ।’
‘‘जि तौ तेरे संग भौतु बुरौ भयौ सुखना।’’- काका नें धीरज बधाइबौ चाहौ।
‘अब कहा बताऊँ आपु कूँ काका, एक तौ पहले तैई घर-गिरस्ती की हालत खस्ता हती, ऊपर तें द्वै लाख रुपैयाऊ भरने परिेंगे। काहू की भलाई के लैऊं बीच में परिबौ आजु-कल्लि दुखदाई ह्वै जाऔ करै है काका।- बताबत-बताबत सुखना कौ गलौ रुँधि गयौ औरु आँखिनु तैं आँसुन की धार बहि निकरी। सुखना की जि हालत देखि कें काका हूँ द्रवित ह्वै उठे, - ‘‘फिरि तैनें थाने में रपट नाँय लिखाई का सुखना?’’
‘अब आपु कूँ कहा बताऊँ काका। रपट तौ लिखाई हतीं, परि आपुनें जि आजु कौ अखबारु नाँय बांचै का? जामै कम्पनी कौ पूरौ भण्डाफोड़ कियौ है। विनीत ही नाँय जाने कित्ते छोरानु कूँ नौकरी कौ झासों दै कें, बु लक्खौ रुपैया डकारि गयौ है।’
‘‘तू देखिओ सुखना, पकर में आय गयौ तौ पुलिस डंडा मारि-मारि कें सब बसूलि लेगी कम्पनी बारें तें।- काका नें धीरजु बंधायौ।
पकर में आवैगौ तब न, परि अबई तौ मांगिबे बारेनु नें जि गति बनाय दई है काका, ज्यौं विनीत नें बिन की नौकरी के लिये न लैंकें, अपनी नौकरी लगाइबे कूँ रुपैया उधार लिए होंय उनते। 
जानैं कौन जनम कौ पापु उदै है गयौ है काका, जु बैठे-ठाले कौ जि दंडु मिलि गयौ है मोकूँ।’
तू ठीक कहि रहौ है सुखना, ऊपर बारे की लीला कूँ समझिबौ भौतुई कठिन है। बूं छिन भर में राजा कूँ रंकु औ रंक कूं राजा बनाय दैबें है। वा कौ सुमिरन ही अब तोकूँ पार लगाबैगौ।

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जैसी  करनी

जेठ माह की तपती दुपहरिया, लूँ के थपेड़े सायं-सायं करत भये म्हौडे़ पै तमाचै सौ मारि रहे होंय, ऐसे में आठ कोस की पैदल यात्रा करत-करत मेरौ म्होंड़ों अंगारे सौ लाल परि गयौ औरु देह में पसीना के मारें चेंटी सी रेंगिबे लगीं। प्यास के मारें गरौं सूखौ जाय रहौ हो। बस्स जि समझौ कें मेरी हालत ऐसी है गई हती कै थोड़ी-भौतु देर में आस-पास कोऊ बाबरी या कूआँ-तालाब नाँय मिलौ औरु बैठिबे कूँ काऊ वृक्ष की छाया नाँय मिली तौ मेरो तौ राम-नाम सत्य ही है जायगौ। घबराहट के मारें मेरौ बुरौ हाल है रह्यौ हो। मैंने इतै-उतै कूँ नजर दौड़ाई तौ थोरी सी दूरि पै कछु वृक्षनु कौ झुुंड सौ दिखाई दियौ। मैं उतकूँ ही चलिबे लगौ।
थोड़े और ढिंग पौहौंचि कै मैंने देखौ कें बा जगै पै तौ नीम, पीपल औरु बरगद केहू वृक्ष लगे भये हतैं जिनके बीच में एक मंदिर हू दिखाई दै रह्यौ है। मैं थोड़ौ औरु बा बगीची सी में घुसि गयौ। मैंने देखौ कें मंदिर के सामनें एक पक्कौ सौ चबूतरा हू बनौ भयौ है जापै एक साधू बाबा औरु 4-6 लोग लुगाई हू बैठे भये हैं। 
वृक्षनु के बीच ठंडी-ठंडी छाया पायकें मेरे मन कूँ बड़ौ ही सकून मिलौ औरु मैंने सबकूँ जै रामजी की करी। 
‘‘अरे आऔ-आऔ पथिक, कहाँ ते आनौ है रह्यौ है? बैठों।’- मेरे म्होंडे़ की लंग कूँ देखत भये साधू बाबा नें पूछी।
आय तौ भौतु दूरि ते रह्यौ हूंँ बाबा, जा धूप औरु प्यास नें मोकूं बेहाल सो करि दयौ है, याही तें छाया औरु पानी की आस में जा बगीची में घुसि आयौ हूँ।
चैं नाँय, चैं नाँय, अरे ऊपर बारे की किरपा तें जा बगिया में तुम कूँ छाया हूँ मिलेगी और पीबे कूँ सीतल जलु हू। बैठो। थोड़े सुस्ताय लेऊ, फिर जलु हूँ मंगाऊ हूँ। कहिकें साधू बाबा नें एक छोरा कूँ आवाज लगाई तौ थोरी सी ही देर में बूं एक हाथ में जल कौ लोटा औरु दूसरे हाथ में एक तस्तरी में गुड़ की डेली लैं के आय गयौ। 
‘‘लेऊ, जल ग्रहण करौ।’ साधु बाबा नें कही औरु अपनी बात कूँ आगे बढ़ाबत भये बोले -पथिक, बू कहाबत सुनी है कैं नाँय,-‘‘कोस-कोस पै पग धुबै, तीन कोस पै खाय। कहै घाघ तें भड्डरी, मन आवै तहाँ जाय।’’
मैंने जल तें हाथ-मुँह और पाँय, धोये औरु फिरि गुड़ खाय कें ऊपर ते जल पी लियौ। सचमुच ही मेरी थकावट आधी रहि गई। थोड़ौ सुस्तायबे की नीयत तेे मैं हू बा चबूतरा पै पालथी मारि कें बैठि गयौ।
‘‘हाँ तौ पथिक, अब सुनाऔ, कहाँ तें आइबौ है रहौ है औरु कहाँ कूँ जाय रहे हौ ?’’
मैंने अपने आयबे औरु जाइबे कौ मुकाम साधु बाबा कूँ बतायौ। साधू बाबा कूँ देखिकें मेरे मन में एक जिज्ञासा सी कुलबुलाई तौ पूछि बैठो-
‘‘बाबा, जि जीवन कैसी पहेली है? काहू कूँ अपार दुःख ही दुःख दै दियौ है ऊपर बारे नें तौ काहू कूँ सुख ही सुख। जि दुःख और सुख चैं बनाये हैं ऊपर बारे नें?’’
मेरी बात सुनिकै साधु बाबा मंद-मंद मुस्कराये-
पथिक या संसार में सब प्राणी अपने-अपने करमनु कौ ही फलु भोगौ करें हैं। जानें अच्छे करम करे हैं बू अच्छौ सुख भोगों करैं है औरु जिन्नें बुरे करम करे हैं बू दुःख भोगों करै हैं। मानसिक दुःख औरु देह कौ दुःख हू।
काहू के सन्तान नाँय भई तौ बू दुखी है। काहू के सन्तान है गयी परि निकम्मी निकरि गई तबऊ दुःख। काहूँ के पास गुजारे लायक हूँ पैसा टका नाँय हतै तौ काहू कौ कोऊ नाते-रिश्तेदार असमय ही गुजरि गयौ। बस्स याही तरियाँ के भौतु सारे दुःख जा धरती के प्राणिनु के संग लगे भये हैं जिन्हें भोगत भये बू अपने-अपने मन में दुःखी होबै करें हैं।
जेई बात तौ मैं कहि रहौ हूँ बाबा, कें भौतु सारे दुःख, मन कूँ दुःखी करें हैं परि जा कौ प्रमाणु कहा है कैं बुरे करम करिबे के कारन ही हमें दुःख मिलि रहौ है। ऊपर बारे नें कोऊ ऐसौ ज्ञान चैं नाँय दयौ जातै मानुष कूँ जि बात याद रहै कें बानें पिछले जनम में जि अच्छौ या जि बुरौ करमु करौ हतो, जा कौ जि फलु बाकूँ मिलि रह्यौ है, ताकी फिरि बू बैसों बुरौ करमु करै ही नाँय। खाली जि सोचिकें कें हमनें पिछले जनम में कोऊ बुरौ करम करौ होयगोए जाकौ दुःख भोगनो परि रह्यौ है, या बात तें पूरी तसल्ली तौ नाँय मिलै।
जि बात तौ तू ठीक ही कह रहौ है पथिक, परि मेरों मानिबौ कछु औरु है। मैं जि मानूं हूँ कें सब प्राणिनु कूँ याही जनम में अपनी-अपनी करनी कौ फलु भोगनों परै है। बूं अलग बात है कें जा करमु कूं हम काऊ लोभ, मोह स्वारथबस या अनजाने में अच्छौ समझि कें करि रहे हैं बूं अच्छौ नाँय होय।
‘अच्छौ समझि कें करि रहे हैं बूं अच्छौ नाँय होय, ऐसौ कैसें है सकै है बाबा, कछु समझौ नाँय मैं। कोऊ उदाहरन दैं कें समझाऔ।
सुनि पथिक, तोकूं एक बिरकुलि ही सच्चै किस्सा सुनाय रहौ हूँ ध्यान दै कें सुनियो-
कोऊ चालीस साल पहले की बात है। छटीकरा कौ मुखिया       धनपाल भौतु रहीस आदमी हो। बाके पास भौतु सारी जमीन-जायदाद ही। एक दिना धनपाल अपने खेतनु की ओर तें आय रहो हो। संझा कौ समै है गयौ हतो, वाही समै बाकू सात पथिक दिखाई दिये। धनपाल कूँ देखिकें बिन पथिकनु में ते एक नें बा तें कहीं कै हम व्यौपारी हैं। दूरि ब्यौपार करि कैं लौटे हतें परि अब संझा है गई है याही तें राति कूँ काहू धरमसाला में ठहरिबौ चाहें हैं। का ठहरिबे की ऐसी कोऊ जगै बताय सकौ हो हम कूँ?’’
वा व्यापारी की जि बात सुनिकें मुखिया के मन में आई कें जि ब्यौपारी है, ब्यौपार करि कें लौटि रहे हतें, भौतु सारौ रुपैया-पैसा होयगौ बिनके पास।
याही बात कूँ सोचि कें मुखिया के मन में लोभ समाय गयौ पथिक, औरु वा ही बखत बानें मन ही मन में एक योजना बनाय डारी। बू मन ही मन में प्रसन्न होत भये बोलौ-
‘‘अरे, मेरौ भौतु बड़ौ अहातौ है, व्हाँहीं पै चलिकें आराम करौ, भोजन-पानी करिकें, आराम तें राति भर विश्राम करिकें, सुबह कूँ चले जैयौ।
ब्यौपारीनु नें सोचै, चलौ ऊपर बारे की किरपा तें जि भलौ आदमी मिलि गयौ है तौ याही के ह्याँ ठहरि जात हैं। राति भर की ही तौ बात है, भोर के झुटपुटे में उठिकें चलि दिंगे।
मुखिया नेें उन सातों पथिकनु कूँ लै जायकें अपने अहाते में ठहराय दियौ औरु अपनी घरबारी कूँ कागज की पुड़िया देत भये बोलौ के देखि आजु अहाते में सात ब्यौपारी भौतु सारे माल मथा के संग ठहरे भये हैं, जिनके भोजन में जि जहर मिलाय दैयो।
घरबारी नें बैसौई करौ औरु सातों के सातों ब्यौपारी सोबत के सोबत ही रहि गये। भोर है बे तें पहलें ही मुखिया नें कहा करौ कै सातों की ल्हासनु कूँ अपनी बैलगाड़ी में डरवायौ औरु अपने खेत पें जाय कें, अपने जोहड़ में मट्टी तें दबबाय दयौ। लासें पानी में फूलि कें बाहर न आय जाबें, याही तें बानें अपने नौकर-चाकरनु तें जोहड़ कूँ पाटिबे कौ आदेसु दे दियौ, संगई पूरे गांम में मुनादी कराय दई कें सबु लोग, अपनी-अपनी बैलगाड़िन तें मट्टी भरि-भरि कें मुखिया जी के जोहड़ में डारौ, तालाब कूँ बन्द करनौ है। बस्स मुखिया जी के हुकम की देर हती, दुपहरिया तक सिगरौ जोहड़ मट्टी ते भरिकें सपाट खेतु बनि गयौ, मुखिया जी औरु बिनके परिवारी निश्चिंत ह्बै गये।
समैं बीतिबों करौ औरु मुखियाजी की घरबारी नें एक-एक करिकें सात छोरानु कूँ जन्म दियौ। समैं बीतिबौ करौ औरु सातों छोरा जवान पट्ठा है गये, एक तें एक मलूक औरु मैया-बापू कूँ भायबे बारे।
एक दिना का भयौ कें द्वै भैया खेत में सिंचाई करिबे कूँ फावड़ों लैं कें खेत पें गये, औरु एक-एक करिकें क्यारिनु में पानी काटिबे लगे।
एक क्यारी में पानी चल्त-चल्त जब भौतु देर है गई औरु बू क्यारी पूरी नाँय भरी तौ एक छोरा की नजरि बा क्यारी के बीचों-बीच है गये एक गड्ढा पै परी जामैं पानी भलल-भलल करिकें घुसौ जाय रहौ हो। बानें छोटे भैया कूँ आवाज दई और दोऊ जनें अपनों-अपनों फावड़ों लैकें फैलि परे मांटी तें बा गड्ढा कूँ बंद करिबे।
अचानचक ही एक कौ पैर फिसलों औरु बूं वा गड्ढा में घुसौ चलौ गयौ, दूसरे नें देखौ तौ बा की चीख निकरि गई और बा नें भैया कूँ पकरिबे की कोसिस करी, परि बा ही के संग दूसरौ हूँ गढ्ढा में घुसौ चलौ गयौ।
भौतु समै तक जब दोऊ भैया खेतु भरिकें घर नाँय लौटे तौ मैया कूँ चिन्ता भई-
‘‘अरे प्रेमपाल, नैक खेत पै जाइकें तौ देखि, तेरे दोऊ भैया, अबई तक नाँय लौटे, खेतु भरिकैं, भौतु देर है गई।’’
और मैया की बानी सुनिकें प्रेमपाल अपने संग हरपाल कूँ लैंके खेत पै पहुँचै। दोऊ भैयानु नें खेत पै जायकें देखौ कें, खेत की एक क्यारी में एक बडौ सौ गड्ढा है गयौ है जामें सारौ पानी भलल-भलल करिकें जाय रहौ है और बिनके दोऊ दाऊन कौ कहूँ अतौ-पतौ ही नाँय है।
अब प्रेमपाल औरु हरपाल बा गड्ढा कूँ बन्द करिबे लगे तौ बिन दौनोनु की हू जल समाधी लगि गई। गाम भर में हल्ला है गयौ कें मुखिया जी के छह छोरानु कूँ खेतु लीलि गयौ। देखिबे बारेनु की भीड़ जमा है गई। क्यारी के बीचों-बीच भये गड्ढा कौ आकारु बढ़तौई जाय रह्यौ हो। मुखिया जी औरु बिनकी घरबारी हूँ रोबत-कलपति भये व्हां पहुँचे औरु बिलापु करिबे लगे। तबई बिनकौ सबतें छोटों छोरा बोलों कें ‘‘बापू काहे कूँ बिलाप करि रहे हौ, जितौ तिहारे ही करमनु कौ फलु फलि रहौ है। यादि करौ पच्चीस साल पहलें याही जगै पैं तुमनें सात ब्यापारिनु कूँ जहर दैकें बिनकी ल्हासनु कूँ गाढ़ौ हतो। हम, बू ही सातों के सातौ तिहारे छोरा बनिकें आये हते। छह तौ चले गये औरु अब मैं हूँ जाय रहौ हूँ।’’ कहत भये सबतें छोटौ छोरा हूँ बाई गड्ढा में समाय गयौ तौ मुखियाजी औरु बिनकी घरबारी धाड़ मारि कें बेहोस है गये।
होस आइबै पै मुखिया जी तौ सबु कछु छोड़ि कें साधू बाबा बनि गये औरु बिनकी घरबारी की धन-सम्पत्ति धीरे-धीरे करिकें लोगनु नें हड़पि लईं। बूं भागिकें अपने एक रिस्तेदार के ह्याँ मथुरा आयकें रहिबे लगी। आजहूं अपनी करनी कूँ यादि करि-करि कें रोइबो करें हैं। तौ पथिक अपने करमन कौ फलु तौ याही जनम में भोगनौ परै है।
साधू बाबा की भर्राई भई आवाज कूं सुनिकें मैंनंे बिनके म्हौंड़े के माँई देखौ। साधू बाबा की आँखिनु तें झर-झर आँसू बहत भये देखि कें मैं समझि गयौ कै जे साधू बाबा कोऊ औरु नाँय, मुखिया जी ही हैं। 

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भाग कौ लेखौ

रंजना नें बाँके बिहारी जी की मूरत कूँ एक बार फिरि तें निहारौ और हूक दै कैं रोय पड़ी। हे प्रभू या जीवन की पहेली कूँ और मति उरझाऔ। मोय नाँय पतौ के मोसें कौन से जनम में कित्ते पाप भये, परि या जनम में तौ अपने जान्त भये कोऊ ऐसौ बुरौ कामु नाँय करौ जाकी इत्ती बड़ी सजा तू दै रह्यौ है।
कोऊ दसेक बरस पहलें रंजना जा गाम में आई हती। बाकौ भौतु सुन्दर सौ रूप-रंग और नाजुक सौ सरीर देखि-देखि कें गामवासी हँसी-ठट्टा करौ करें हे-
‘अरे! जि हूर की परी जा गाम में कहाँ ते आय गई?’
कोऊ-कोऊ तौ ह्याँ तक कह दै हो, -‘‘अरे जि डाकटरनी गामबारेन कौ इलाज का करैगी, जाके रूप-रस के लालची भौंरा ही जाकूँ नाँय करन दिंगे।’’
डाॅक्टर रंजना कौ रूप हो ही अनौखो, पतरी-सी सुतमा नाक, पतरे-पतरे गुलाबी होंठ, कजरारे पैनें नैंन, गोरौ चिट्ट रंग और इकहरे-छरहरे बदन पै नागिन-सी बलखाती लम्बी चोटी। जब बु अस्पताल कूँ जाऔ करै ही तौ मारग में देखिबे बारे मंत्र बंधे-से एक ही ठौर पै खड़े के खड़े रह जायैं। 
जा गाम में अस्पताल बनिकैं तैयार भयौ तौ कोऊ डाक्टर-डाक्टरनी जा में आइबे कूँ ही तैयार नाँय हौ। पचास बहाने बनायकें अपनी-अपनी पहौंच के बलबूते पै कोऊ काहू की सिफारस तें तौ कोऊ काहू की सिफारस तें अपनौ तबादलौ जा गाम में होयबे तें  रुकवाय लेतौ।
‘‘अरे, जा गाम में रहकें का अपने छोरा-छोरिनु कौ जीवन खराब करनौ है, न ढंग कौ सौ कोऊ स्कूल और न आइबें-जाइबें कों मारग ही। कैंसे करिंगे कैंसे रहिंगे ह्याँ।’ औरु भौतु सारे बहाने, गाम में न रहबे के। गाम बारेनु के संग काऊ कूँ कोऊ हमदर्दी नाँय, कैंसे रहें हैं गामबारे ह्याँ। आस-पास के काऊ गाम में एक हू अस्पताल नाँय हैबें ते कैसी-कैसी मुसीबत कौ सामनौं करें हैं और हारी-बीमारी में कैंसे दूर सहर में जाइकें अपनी दबा-गोली कराबैं हैं। जा बात कौ अंदाजौ इन बड़े-बड़े सहरनु में रहिबे बारे डाक्टरनु कूँ कहाँ तैं होबै, बु तौ अपने ही सुख सुविधान कूँ जुटायबे में लगे रहैं उमरिभर। याही सब कौ ध्यान करिकें द्वै चार गाम बारेन नें आपस में मिलिकें सलाह-मसबिरा करौ और जा गाम में एक अस्पताल ख्ुालबायबे की मुहिम छेड़ि दई। गाम के परधान जी के संग गाम के ही चार-छै पढ़े लिखे छोरानु नें लिखा-पढ़त और भागदौड़ करी तौ कैऊ बरस में जायकें जा गाम में अस्पताल बनिबे के तांई जांच पड़ताल और फिरि नाप-तोल हैंबों सुरू भयो हो। कैऊ-बरस में जायकें जि अस्पताल बनिकें तैयार भयौ तौ अगली मुसीबत जे सामनें आई कें ह्याँ जा काऊ डाॅक्टर कूं भेजौ जाय बुं ही या तौ गाम में झांकै ही नाँय और अगर काहू तरियाँ झाँकि हू जाय तौ काऊ न काऊ बहाने ह्यातें भागि जाऔ करै हो।
डाक्टर रंजना कौ तबादलौ जब सरकार नें जा गाम में करौ तौ बिनकौ मलूक सौ नाजुक सरीर देखि-देखि कें गाम के लोग-लुगाई अचरज सौ करिबे लगे और सबके मन में जे ही संका बैठि गई कै अब तक जित्ते हूँ डाक्टर जा गाम में आये, कोऊ चार दिना नाँय रूकौ तौ जि परी सी मलूक डाक्टरनी चैं रुकैगी, जाकूँ सरकार नें कहा सोचिकें ह्याँ भेजौ है? लगै है जा गाम की तकदीर में कोऊ डाक्टर लिखौ ही नाँय है।
डाक्टर रंजना नें गाम के अस्पताल कूँ देखौ-परखौ और फिर परधानजी कूँ संग लैं के पूरे गाम की जांच-पड़ताल सी करी। भौतु सारे घरनु के भीतर हूँ गई, बातचीत करी और भौतु सारे घरनु में बीमार पड़े मरीजन कूँ देखौ-भालौ हू।
गाम के छोरा-छोरिनु की भीड़ डाकटर रंजना के संग-संग तमासौ सौ देखत भये चलि रही ही, जाकूँ प्रधान जी चल्त-चल्त ही डाँट-डपट हू करि देयौ करै हे। जा काऊ घर में बु घुसि जाबै ही, वा घर के लोग-लुगाई बिनके सामनें हाथ जोरिकें खड़े ह्वै जाबें हे और दूध, दही, रायतौ और ग्रामीण खाद्य पदारथरन तें बिनकौ, देवता की तरियां स्वागत-सत्कार करिबे लगि जाबै हे। डाकटर रंजना गाम बासिन के जा भोले रुप पै मन ही मन मुगध ह्वै रही ही। बु तौ जनम तें अब तक बड़े-बड़े महानगरन में ही रही ही और चन्ट-चालाक लोगनु तें ही वास्तौ परौ हो। गाम के लोग-लुगाई अल-छल तें परे, ऐसे भोले-भाले होय हैं, जि तौ बु पहली बार ही देखि रही ही। गाम बारेनु के जा भोलेपन नें डाकटर रंजना कौ मन मोहि लियौ और बिननें जा गाम में सेवा करिबे कौ मन बनाय लियौ। बिननें अस्पताल कूँ व्यवस्थित करिबौ सुरु करौ तौ गाम के किसाननु नें भौतु सहारौ दियौ। अस्पताल में फूल-फुलवारी हूँ लगि गई। जरूरत की दवा-गोली हू आय गईं।
गाम के अस्पताल में डाकटरनी आय गई है जि खबर जंगल में आग की तरियाँ दूर-दूर तक गामनु में फैलि गई तौ अस्पताल में आइबे बारे मरीजनु की संख्या बढ़िबे लगी। डाकटर रंजना सब काऊ कूँ तसल्ली ते दबा दैबें और अपनी मिसरी-सी मीठी बोली तें सब कूँ तसल्ली हू दियौ करै। थोरे से ही दिना में डाकटर रंजना अपने अच्छे ब्यौहार और योग्यता के कारन गाम बारेनु के हिये में समाय गई और बु डाकटर रंजना तें डाकटर दीदी बन गई।
डाकटर रंजना अपने मैया-बापू की इकली ही औलाद ही, सो कछु दिना में बु मैया-बापू कूँ हू लिबाय लाई। पूरी उमरि सहर में रहे मैया-बापू नें गाम में रहिबौ सुरू करौ तौ बिनकूं भौत ही नीकौ लगौ। सब लोग डाकटर दीदी कूँ भौतु मान्त हे सो बिनके मैया-बापू कूं हू भौत आदर दैबे लगे।
मैया-बापू ने अब रंजना कौ ब्याह करिबे की सोची और रंजना के लायक बर की खोज सुरू करि दई। अपने ही क्षेत्र कौ एक छोरा बिनकूं मिलि गयौ जाके संग, रंजना को ब्याह करि दियौ गयौ।
अपने ब्याह के लयें जित्ती छुट्टी डाकटर रंजना नें लईं हतीं बिनके बीति जाइबे पैं जब बु लौटिकें अस्पताल आई तौ गामबारेनु की, मिलिबे के तांई भीड़ इकट्ठी ह्बै गई।
डाकटर रंजना कौ ब्याह जाके संग भयौ हो, बानें हू डाकटरी ही पढ़ी हतीं। डाकटर रंजना नें अपने ही अस्पताल में अपने ब्याहता मदन कूँ हू लगबाय दियौ। द्वै-तीन बरस ही बीते हुंगे कें डाकटर मदन की विदेस के एक अस्पताल में नौकरी लगि गई। रंजना नें भौतु चाहौ कें डाकटर मदन य्हाँ गामबारेनु की सेवा करें परि मदन नें नाँय मानी और विदेस चलौ गयौ। विदेस में मदन कूँ भौत सारौ रुपैया-पैसा मिलौ करै हो याही तें बानें रंजना कूँ हू गाम के अस्पताल कूँ छोड़ि-छाड़ि कें अपने पास बुलाइबे कौ संदेसौ भैजौ। जि संदेसौ जब गामबारेन कूँ पतौ चलौ तौ बिनके नैननु तें आँसुन की धार बहि निकसी।
गाम बारेन के दयनीय से म्हौड़ेनु कूँ देखिकें डाकटर रंजना नें विदेस जाइबे कौ बिचार त्यागि दयौ। मैया-बाप नें हू रंजना कूँ भौत समझायौ परि बूं जबहू विदेस जाइबे की सोचें, गाम बारेन के निरीह म्होड़े सामईं प्रकट ह्बै उठैं। रंजना नें विदेस कौ मोह छोड़िकें गामबारेनु की सेवा करिबे कौ ही निस्चै करि लीनौ। 
भौतु समै बीति गयौ। डाकटर रंजना कौ पुत्र हू एक बरस कौ ह्बै गयौ परि या बीच मदन नें पलटि कें नाँय देखौ। रंजना की मैया याही चिन्ता में घुरिबे लगी और एक दिना ऊपर बारे कूँ प्यारी ह्बै गई। अब रह गये बूढे़ बापू और तीन बरस कौ देबू। देबू कूँ बापू के भरोसे छोड़ि कें रंजना दिन भर मरीजनु के बीच ही घिरी रहै ही।
एक दिना का भयौ कें बापू पक्के फरस पै फिसलि गये। रंजना कूं संदेसो मिलौ तौ दौड़ी-दौड़ी आई, परि तब तक सिर तें इत्तौ खून बहि गयौ के बापू कौमा में आय गये। अब तौ रंजना के ऊपर मुसीबतन कौ पहाड़ ही टूटि परौ। भौतु कोसिस करिबे के बाद हू बु अपने बापू कूँ नाँय बचा पाई।
ऊपर बारे कूँ जानें कहा मंजूर हो, रंजना बापू के गम में उबरि हू नाँय पाई ही कें एक और मुसीबत कौ पहाड़ टूटि परौ- विदेस तें आये एक परिचित नें मदन के बारे में जो बतायौ बाकूं सुनिकें रंजना के पैरनु के नीचे तें धरती खिसकि गई और बु बेहोस ह्बै कें धड़ाम तें गिर गई। मदन नें विदेस में दूसरी घरबारी करि रखी है जातें हू छोरा-छोरी हू हैं।
अब रंजना की समझ में आई कें कैऊ बरस तें मदन नें बा की कोऊ सुधि चैं नाँय लई। इत्तौ बड़ौ धोखौ?
एक के बाद एक, कैऊ झटकानु कूँ झेल्त भये, भीतर ही भीतर टूटि गई रंजना बांके बिहारी जी की सरन में लोटि गई- ‘‘हे प्रभु! कब तलक जे विदेस गये मदन निरदोस भारतीय ललनानु कूँ या ही तरै छलिबौ करिंगे?

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यक्ष -प्रस्न

डाकटर उषा यादव की कहानी ‘‘सांसनु को तार’’ पढ़त भये अचानचक ही मोकूं अपने पड़ौस की घटना याद आय गई।
मेरे पड़ौस में रम्मू कौ ब्याहु है कें जब आयौ हो वा ही बरस मैंनें अपने गाम के स्कूल की पढ़ाई पूरी करी ही और वा के बाद मोकूं गाम तें बाहर पढ़िबे कूँ जानों परौ हो।
गाम तें साठ-पैंसठ मील दूर पढ़िबे के कारन मेरौ गाम कूँ आयबौ हू बन्द सौ है गयौ। या तौ कबऊ काहू त्यौहार पै आयबौ हैबे हो या फिरि भौतु मन करौ तौ बीच में हू एकाध बार आय जाबै हो।
रम्मू कौ ब्याह भयौ तौ गाम की रीति-रिवाजनु को पालन कर्त भये, गाम भर की लुगाईं रम्मू की बहू की ‘म्हौं दिखरौनी’ करिबे कूँ आइबे लगीं। जोऊ म्हौं दिखरौनी करिकें जाबै, रम्मू की घरबारी के रूप-रंग की प्रसंसा कत्र्त-कत्र्त नांय थकै ही-
‘‘अरे! जे रमुआ की घरवारी तौ लाखनु में एक है। कहाँ तें लै आयौ इत्ती सुन्दर।’’
‘अरे, छोरी बारेनु नें मेलु हू नाँय मिलायो होगौ- ‘हूर की गोद में लंगूर, खुदा की कुदरत’ बारी कहावत चरितार्थ है रही है।’
जित्ते लोग लुगाइन तें बात करौ, सब की जुबान पै बस्स जे ही बात-‘‘कहा देखिकें ब्याह कियौ है ऐसी मलूक छोरी कौ, जा कलूटा के संग?’ 
‘अरे रमुआ की जमीन-जायदाद पै मरि गये हुंगें नांय तौ है का रमुआ में? पढ़ौ नाँय, लिखौ नाँय, ऊपर ते रंग कौ न रूप कौ।’
जित्ते म्हौं, उत्ती बात। याही तरियाँ पूरे गाम में जा ही बात की चरचा भौतु दिना तक रही।
रम्मू की घरवारी मलूक ही नाँय ही, गुननु बारीऊ ही। बूं भोर में भौत सबेरे जागि जाऔ करै ही औरु घर की झाड़ू बुहारी, चैका-बरतन कौ कामु निपटाय कें, नित्य क्रियानु सों निपटि कें स्नान-ध्यान हू करि लेऔ करै ही तब जायकें सासु-ननद अपनौ बिस्तर छोड़ौ करै हीं। बिन के जागि जाइबे के बाद रम्मू की घरवारी सबके पैर छुऔ करै ही और फिरि सबकूँ चाय, दूध, मट्ठा दैंके, घर के औरु-औरु कामनु में लगि जाऔ करै ही। वा के सुलच्छिननु की महक सारे गाम में फैलि गई हती।
भौतु दिननु के बाद या बेरि जब मैं गाम कूँ आयौ तौ मोकूँ रम्मू के घर के पिछवारे काहू के कराहिबे जैसी आवाज सुनाई दई। मैंने गली में इत-उत कूँ झाँकौ, गली में तौ कोऊ नाँय है। मैं थोरी सी देर एक ही ठौर ठैरि गयौ। काहू के कराहिबे जैसी आवाज फिरि तें आई। मैंने फिरि तें गली में इतै-उतै कूँ देखौ। गली में तौ अबऊ कोऊ नाँय दिखौ। मैंने रम्मू के घर की दीवार तें अपनों कान सटाय दियौ। मोकूँ लगौ कें जि आवाज तौ दीवार में ऊपर बनी खिरकी तें आय रही है। मैं चैंकि उठौ। जरूर ही कोऊ हारी-बीमारी है रम्मू के ह्याँ।
मैंने अपनी मैया तें जा बारे में पूछौ। पहलैं तौ मैया नें एक-द्वै बेरि मेरी बात कूँ, बातनु में ही टरकाय दियौ, परि जब मैंने हठ करी तौ मैया नें जु बतायौ बाकूँ सुनिकें मेरौ भावुक मन रोय परौ।
मैया नें बतायौ कें रम्मू की मैया नें रम्मू की घरवारी कूँ जा कुठरिया में बन्द करि दयौ है। कोऊ घरवारौ ना तौ बा तें मिलि सकै है औरु ना बा कूँ कछु खायबे-पीबे कूं हू दै सकै है।
सुनिकें मौकूं भौतु अचरजु भयौ। जा की प्रसंसा पूरे गाम नें करी हती, बातें ऐसी कौन सी खता है गई जु कुठरिया में बन्द करि दीनी है? मैंने जानिबे की हठ करी तौ मैया नें मोकूँ झिड़क दियौ-
‘अरे, तू अबई नाँय समझैगो, कहा बताऊँ तो कूँ?’
‘‘मोकूँ कछु तौ बताऔ, देखौ जा खिरकी तें कैसी निरीह सी कराहिबे की आवाज आय रही है, जिनकूँ सुनि-सुनि कें मेरौ तौ हियौ फटि रहौ है।’’
‘तू नाँय मानि रहौ तौ सुनि, रम्मू की घरवारी के मैया-बाप गरीब हैं याही तें ब्याह में अधिक दान-दहेज नाँय दै पाये हे। अब रम्मू की मैया, रम्मू की घरवारी कूँ खूब खरी-खोटी सुनाऔ करै है। परि बूं कहा करै। दैबें कूँ कछू होतौ तौ इत्ती मलूक छोरी कूँ जा कौआ से कलूटा रमुआ तें ही ब्याह करते का? कोऊ अच्छौ सौ छोरा न देखते। दान-दहेज के बगैर, रम्मू की घरवारी के सारे गुन फीके परि गये हतैं, रम्मू की मैया के आगे।
‘‘परि ऐसै तौ बूं मरि जावैगी?’’- मेरौ भावुक हियौ बिह्नल है उठौ।
‘जेई तौ जि चाहेे हैं कैं, जि जल्दी तें मरि-मराय जाय तौ दूसरी जगै तै खूब दान-दहेज लें कैं, रमुआ कौ दूसरौ ब्याह करि दैबें।’
‘‘परि कोठरी में बन्द करिकें रखिबे कौ कहा मतलबु है?’’
‘मतलबु चैं नाँय है, खूब मतलबु है। ताकि कोऊ बाते मिलै नाँय, बातचीत नाँय करै और चोरी-छिपै बाकूँ कछु खायबे कूँ ना दैबें।’
‘‘कहा कहि रही हौ मैया, तौ बा कूँ जे कछू खाइबे-पीबे कूँ हू नाँय दै रहे?’’
औरु नईं तौ का। कबऊ-कबऊ रमुआ की भैनि, जि बातें इत-उत बताय दैबों करे है, नांही तौ कैसें पतौ चलै। द्वै-चारि दिना में एकाधु रोटी कौ टुकड़ा, बा कूँ थमाय दैवें हैं ताकि बूँ भूखी रहि-रहि कें मरि जाय या फिरि पागल है जाय। फिरि जे बा कूँ पागल कहिकें, रम्मू कौ दूसरौ ब्याहु करि दिंगे।
रम्मू की भैनि बताय रही ही कें भौजी, कोठरी में बन्द दीवार तें बात करिबौ करै है, रोबें है, झींकै है परि मैया कूं नैकऊ तरस नाँय आबै। कबऊ-कबऊ जब हममें तें कोऊ, भौजी कूँ, कोठरी तें बाहर निकारिबे की कोसिस करें हैं तौ मैया भौतु बुरौ-भलौ कहै है संगई कोठरी कौ बाहर तें तारों मारिकें, चाबी अपने पास रखि लेऔ करै है।
‘‘अपनी घरबारी की जि हालत देखि कें रम्मू अपनी मैया तें कछू नाँय कहै?’’ -मैंने पूछी तौ रम्मू की भैनि बोलि परी-
‘मैया के आगें, चूं करिबे की हू हिम्मत नाँय है दाऊ में। बूं तौ मैया के डर तें, दुम दबाय कें बाहर आयि जाबै है।’’
‘अच्छौ, जि बात है तौ फिरि देखौ, मैं कहा करूँ हूँ। अबई पुलिस में रपट लिखाय कें आऊँ। दहेज के आरोप में सिगरे घर बारे अन्दर बन्द है जाबिंगे, तब पतौ चलैगौ काहू की धीय कूं कैसें सतायौ जावै।’’- कहत भये मैं चलिबे लगौ तौ मैया नें मोकूं पकरि लियौ।
‘अरे माँ, अन्यायी को संग दैबे बारे हूँ तौ दोषी माने जावै हैं।’
‘‘तू ठीक कहि रहौ है, परि तू अबई छोटौ है, इन बातनु कूँ नाय समझैगौ। जि मुहल्ला- पड़ौस की बात है, उमरि भरे कूँ दुसमनी और बंधि जाबैगी।’’
अगली बेरि जब मैं गाम कूं आयौ तौ पतौ परी कें रम्मू की घरबारी कूं मरे भये तीन महीना हू नाँय बीते हुंगे कें दूसरौ ब्याह करिबे बारेनु की लाइन लगी परी है। 
मोकूं लगी कें मैं रम्मू के घर की बा ही दीवार की खिरकी के नीचें खड़ौ भयौ हूँ जातें हिय कूँ हिलाय देंबे बारी कराह बाहर आय रही है। रह-रह कें हिय कूँ मथिबे बारी कराह जु कह रही है कें ‘कोऊ मोय बचाय लेऊ।’
भीतर ही भीतर मेरौ खून खौलि उठौ- ‘हत्यारे कसाई हैं जे। इनकी असलियत कूं अब मैं सबके सामनें बेपर्दा करिकें ही रहूँगौ नाहीं तौ जि हत्यारे काहू और की धीय कूँ हू यौं ही सताविंगे। कोठरी में बन्द करिकें भूखौ राखिगें और वा के मरिबे कौ इन्तजार करिंगे ताकि फिरिते तीसरौ ब्याह करि सकें।
मेरौ इरादों, मैया नें भाँपि लयौ। बिननें मेरौ हाथु पकरौ औरु भीतर कूँ खैंचि लें गई-
‘कहाँ जाय रहौ है? ऐं! तू का समझै है कें तेरी बात पें भरोसों करि लिंगे सबु। अरे भैया, जि कलजुग है। तू बिनके भले की कहैगौ और बू समझिंगे कें जामें तेरौ कोऊ स्वारथ होयगौ याही तें भांजी मारिबौ चाहै और नाँय मानै तौ आजमाय कें देखिलै। मुहल्ला-पड़ौस की बात है सिवाय उमरि भरे कूँ दुसमनी बाँधिबे के, होयगौ कछू नाँय।
मैं मन ही मन गुस्सात भयौ वापस चलो गयौ हो। कछू दिना बाद ही जब मैं गाम कूँ आयौ तौ छूटतई मैया नें मौपे तानौ कसौ-
‘‘देखि, तू भौतु जोस में आय रहौ हो बा समै। तू तौ मैंने रोकि दियो हो, परि इन्दर की मैया नांय रोकि पाई ही इन्दर कूँ। इन्दर नें द्वै-चारि औरनु कूँ संग लैकें छोरी बारेनु कूँ भौतेरौ समझायौ, परि भयौ का? रम्मू की मैया कूँ पतौ चलौ तौ इन्दर के घर बारेनु कूँ ही नाँय बाकी सात पीढ़ीनु तक कूँ खूब तौ गारी दईं और बोल- चाल बन्द है गई सो अलग।’’
‘और रम्मू के ब्याह कौ का भयौ?’’- मैंने जिज्ञासा प्रकट करी।
‘‘ब्याहु, ब्याहु हूँ है गयौ, खूब धड़ल्ले तें।’’
‘कहा कह रही हो मैया?’ - सुनिकें मैं अचरज तें भरि उठौ। कहा है गयौ है इन छोरीं बारेनु कूँ जो सब-कछु जान्त भये हू ऐसौ करि रहे हैं? कौन सी ऐसी मजबूरी है बिनके सामनें? का छोरी अब भौतु बड़ौ बोझ बनि गई है। जाकूँ जल्दी तैं जल्दी, कहूँ ढकेलिकें मैया-बाप हल्के होनौ चाहें।
बौहौतु सारे यक्ष-प्रस्न मेरे मन में उथल-पुथल मचायबे लगे। 

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चीरहरन 

‘जि मानुष कौ जीवन हूँ बड़ी ही विचित्रतानु तें भरौ परौ है, काहू के पास अपार सम्पत्ति है तौ काहू कूँ द्वै बखत की रोटी हू नाँय मिलि पावै है।’
‘‘हाँ जि बात तौ ठीक ही कहि रहे हो काका, परि आजु अचानचक ही ऐसी बात जुबान पै कैसें आय गई?’’
आय का गई भैया, आज मनु कछु आकुल-व्याकुल सौ है रह्यौ है। काहू की व्यथा-कथा सुनिकें अब जा दिल पैं बरदास्त नाँय होय है और बस... डूब जावै है, लीलाधारी की जा अद्भुत लीलामयी दुनिया में।
हाँ, जेई तौ। खैर, छोड़ि। जि बता, कहाँ तैं आय रह्यौ है? काका नें मोकूं ऊपर तें नीचे तक निहारौ और फिरि मेरे हाथनु में पूजा कौ सामान देखि कें खुदि ही बोलि परे- ‘‘अच्छौ, सन्ध्या-बन्दन करि के लौटि रहौ है?’’
हाँ काका, आय तौ व्हाँ तें ही रहौ हूँ, आपु कूँ कछु-सोच-विचार से में डूबौ देखो तौ मेरे कदम थम गये हे। -तौ कौन की व्यथा-कथा आजु आपुकूँ आकुल-व्याकुल करि रही है काका? कछू मोकूँ बताओगे?’’
नाँय, ऐसी तौ कोऊ बात नाँय है भैया, बस्स यौ ही एक परिचित के बारे में सोचि-सोचि कें मन ऐसौ-बैसौ है उठौ हो।
‘‘तौ बताय डारौ काका, बू कहावत है ना, कें मन की बात बताय दैबे तैं, मन कौ बोझ हलकौ है जाबै है।’’
‘‘हाँ सो तो है भैया। है तो दूरि की बात, परि तू नाँय मानें तौ बताय दऊँ हूँ- कल्लि रजनी की चिट्ठी आई हती। बूं आज कल्लि भौतु दुःखी है।’’
‘‘रजनी की चिट्ठी! जि रजनी कौनु है काका? जि नाम तौ आजु पहली बेरि ही सुनि रह्यौ हूँ तिहारे म्हौड़े तें।’’
हाँ, ठीक कहि रहौ है तू, दरअसल एक साल पहलैं तक तौ मैं हूँ नाँय जान्त हो काहू रजनी कूँ, परि जि जीवन हूँ बड़ौ विचित्र है भैया, जा मैं कब, कौनु मिलि जाय और कब, कौनु बिछुरि जाय, कछु नाँय पतौ चलै।
‘‘ठीक कहि रहे हौ काका, जि रजनी तें कहाँ और कैसें भेंट है गई तिहारी, और जि कौनु है?’’
मैंनें काका के म्होंडे़ की लंग देखत भये पूछौ तौ काका नें ऊपर आसमान की ओर निहारौ- ‘‘सब वा ऊपर वारे की लीला है भैया, पिछले बरस मैं एक साहित्यिक कार्यक्रम में गोबरधन गयौ हतो, वाही कार्यक्रम में रजनी हूँ आई हती। अपनौ नम्बर आइबे पै जब रजनी नें अपनों आलेख पढ़ौ तौ सब कोऊ अचरजु करिबे लगे औरु रजनी की विद्वता के कायल है उठे। मौकूँ हू अच्छौ लगौ। मौकौ देखिकें मैंने एक अच्छौ सो आलेख पढ़िबै के लियाँ रजनी की प्रसंसा करि दीनी। सुनिकें रजनी कूँ अच्छौ लगौ फिर मैंनंे रजनी तें वा के घर बार के बारे में चरचा करी। घर-बार के बारे में पूछिबे पैं रजनी के म्हौंडे़ पै उदासी सी छाय गई, जाकूँ देखिकें मैं सहमि गयौ। कछू गलत-सलत तौ नाँय कहि दियौ मैंने। रजनी के म्हौंडे़ की ओर कूँ देखत भये मैंने तुरत ही भूल सुधार करिबे के लैं छिमा मांगी- ‘‘आपकूँ मेरौ कहौ कछू बुरौ लगौ होय तौ छिमा करियौ।’’
सुनिकें रजनी नें हूँ मेरे म्हौंड़े की लंग कूँ देखों और धीरे तें मुसकायबे की कोसिस करी- ‘‘नाँय, आपुनें ऐसों कछू नाँय कहौ। मैं तौ अपने ही आपुमें डूबि गई हती, याही तें.....।’’ रजनी नें बात कूँ अधूरौ छोड़ि दियौ। 
मेरे औरु कुरेदिबे पै रजनी नें बतायौ कें कोऊ 6-7 बरस पहलें तक बाकी घर-गिरस्ती में खूब अमनचैन हतो।
बू अपने घरबारे औरु द्वै छोरानु के संग खूब सुख-चैन तें रह रही हती, परि ऊपर बारे की हू लीला विचित्र है- दोऊ छोरा प्रमुद औरु अमित के ब्याह हौंतई घर में ज्यों संकट कौ दौर सुरू है गयौ।
प्रमुद की घरबारी और अनिल की घरबारी दोनों ई अपने आपु में भौतु हुसियार निकरीं। बिनकूँ अपनी छोटी सी गिरस्ती में सास-ससुर कौ संग रहिबौ हूँ नाँय सुहाबै हों। एक दिना प्रमुद की घरबारी जानें कहाँ तें कछु तंत्र-मंत्र सौ बनवाय कें लें आई और बाकूँ अपने ससुर के कमरा में दीवार में खोदि कें छुपाय दियौ। संझा कूँ ससुर नें दीवार में टूटी सी जगह देखी तौ थोरी सी सीमेंट और बालू में दीबार कूँ ठीक करि दियौ। बस्स, बाही समै तें बु चारपाई पै गिरि गये और एक हफ्ता बाद बिनकी जीवन लीला समाप्त है गई।
सबु कछु जान्त भये हूँ रजनी नें, प्रमुद की बहू तें कछु नाँय कहीं- अब घरबारौ तौ लौटिकें आयबे तें रहौं, बहू-बेटा तें औरु बिगरि जाबैगी, याही सोचिकें रजनी खून कौ घूट पी कें रहि गई। काहू तें कछू नाँय कही। जब कबऊ घरबारे की कोऊ चरचा चलै या संग गुजारे, बीते दिननु की याद आऔ करै तों भीतर ही भीतर रोय लेऔ करै ही रजनी।
एक दिना प्रमुद और अनिल नें अपनी-अपनी घरबारीनु के संग बैठिकें सलाह करी और फिरि चारौ जने रजनी के पास आये। थोऱी देर तक इतै-उतै की बात करी औरु फिरि असली बात पै आय गये। बात की सुरूआत प्रमुद नें करत भये रजनी तें कही कंै जि घर, खेती-बारी हम दोऊ भाईनु के नाम लिखाय देउ। रजनी ने कही कें, मेरे मरे बाद तौ सब तिहारौ ही है। यातें ऐसी काहे की जल्दी है, औरु थोड़े से बरस इन्तजार करि लेऊ।
सुनिकें अनिल गुस्सा है उठौ, बोलौ- ‘‘अपने जीते-जी नाम करि दैबे में कहा नुकसानु है अम्मा? हमका तुमकूं घर तें निकारि दिंगे, जो  ऐसी बात करि रही हौ।’’
सुनिकें रजनी कूँ हू गुस्सा आय गयौ- ‘‘तौ तुम ऐसी बात चै करि रहे हौ, मैं का जा जमीन-जायदाद कूँ अपने संग लै जाऊँगी। मेरे मरे पीछे सब कछु तिहारौ ही तौ है। अब मैरो औरु कौन बचै है जाकूँ जि जमीन जायदाद बांटि जाऊंगी मैं।
अचरज भरे सुर में रजनी नें कहीं तौ अनिल की बहू बोलि परी-‘चैं, भौतेरे तौ लग्गा-तग्गा हैं तिहारे। रोज जानें कहाँ-कहाँ, किन-किन के बीच घूमौ-फिरौ हौ। उनई मैं तें काहू कूँ नाम करि गईं तौ हम तौ देखत ही रहि जामिंगे।’
छोटी बहू कौ इससरौ समझ, रजनी बिलबिलाय उठी। अपनी साहित्यिक रुचि के कारन बूँ भौतु बरसनु तें कवि सम्मेलन में और साहित्यिक आयोजननु में आऔ-जाऔ करै है। घरबारे के जिन्दा रहत भये हूँ बूं पूरे देस में आबत जाति ही है और आजु हूँ चली जाबै है, या तैं बा की साहित्यिक भूख मिटौ करें हैं परि जा कौ मतलब, बहू-बेटा बाके चरित्र पैं उँगरी उठाबिंगे, जि तौ बानें सपने मेंऊ नाँय सोची हती। 
बू भीतर-ही-भीतर तिलमिलाय उठी- ‘‘अच्छौ, तौ जे है तिहारी सोच, अरे करमजरेऔ, जि पराई जाई हैं, जि अपनी सासु कूँ चार दिना में कहा समझिंगी, परि तुम दोनों तौ याही कोख तें जनमे हौ, तुमकूँ हू अपनी माँ पै भरोसो नाँय रहौ जु चुपचाप खड़े-खड़े सुनि रहे हौं इन कारे मूडबारीनु की बातें। का याही दिना कूँ देखिबे के लैया जनम दियौ हो तुमकूँं। रजनी फूट-फूट कें रोय पड़ी-परि बिन चारौनु पै कोऊ असर नाँय परौ। प्रमुद और अनिल एक साथ बोलि उठे- ‘देखिलै अम्मा, तू राजी-राजी हमारे नाम नाँय लिखावैगी जमीन-जायदाद तौ हम मुकदमा करि दिंगे, फिरि कोरट-कचैरी के चक्कर लगाने परैं तौ मति कहियौ कछु। पहलेंई बताय दैबें हैं तुमकूँ।’’
इन कारे मूडनुबारीनु के आवतही इत्ते बदलि जाविंगे बाके कोख जाये, जि बात की तौ बानें कबऊ सोची हूँ नाँय हती, याही तें एक बार फिरितें माँ हैबे की धौंस देत भये बूं बोली-
‘‘अच्छौ, तौ बात ह्याँ तक जाय पौहची है, तुम मोपै मुकद्दमा करौगे। करौ। मैं हू तौ देखूँ कहा कहौगे कोरट में।’’
रजनी कौ इत्तौ कहिबौ हो कें सचमुच ही दोनों सपूतनु नें माँ पै मुकद्दमा दायर करि दियौ। प्रमुद और अनिल नें कटघरा में खड़े हैं के, अपनी सगी माँ के ऊपर जु लांछन लगाये, बिनें सुनिकें रजनी कौ मन करौ कि हे धरती मैया तू अबई फटि जा औरु मोकूँ अपने भीतर समाय लै।
एक माँ के सगे बेटा, कटघरा में खड़े है कें, भरी सभा में द्रौपदी कौ कैसौ चीरहरन करि रहे है और बु अपनी लाज बचाइबे कूँ काहू कृष्ण कूँ नाँय बुलाय पाय रही ही।
‘‘जि तौ भौतई दरद भरी बात बताई काका।’’ मैंनें काका के म्हौंडे़ की लंग कूँ देखत भये कही तौ काका जैंसें नींद तें जागे होंय, रजनी की व्यथा-कथा सुनात-सुनात काका खुदि हूँ काहू लोक में विचरण करिबे लगे हे।
‘‘हाँ भैया, अब तू ही बताय, है कें नाँय भौतु ही दुःख और सरम की बात?’’
बिरकुलि, काका, जातें औरु सरम की बात कहा होयगी कै सगे बेटानु नें ही अपनी मैया की इज्जत पैं कीचड़ उछारी।
‘‘फिरि आगे कहा भयौ काका?’’ 
फिरि आगे? आगे जि भयौ कै जि सबु कलजुग कौ परताप है,सोचिकें रजनी नें, या सरत पें सिगरी जमीन-जायदाद बिनके नाम करि दई कै जब तक बु जीवित है, दोनों छोरा, बाकौ भरण-पोषण करिंगे।
‘‘फिर का भयौ काका?’’ बाके बाद तौ काहू कूँ कोऊ परेसानी नाँय होयगी, न छोरानु कूँ न बहूनु कूँ और न रजनी कूँ ही।’’
जाही बात कौ तौ दुःख है भैया कें अब परेसानी औरु बढ़ि गई। लै देखि जा चिट्ठी में कहा लिखौ है। कहत भये काका नें भीतर तें लाइकें एक चिट्ठी मेरे हाथ में थमाई दई। मैंने चिट्ठी खोलिकें पढ़ी तौ पढ़त-पढ़त ही मेरी दोऊ आँखिनु तें जलधार बहिबे लगी। जमीन जायदाद नाम करवायबे के बाद तौ दोऊ पूत औरु हूँ स्वच्छंद है गये हे। अब बिनकूँ एक माँ कौ भरण-पोषण भारी परि रहौ हतो। अब बु अपनी माँ कूँ ठिकाने लगायबे की जुगत में हैं। 

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बीच कौ मारग

सन्ध्या बन्दन करिकें घर कूँ जाय ही रहौ हो कैं मारग में ही रामहरि काका मिलि गये। मैंनंे बिनकूँ रामा-किसना करी औरु हाल-चाल पूछि लियौ। 
काका नें मोकूं ऊपर तें नीचे तक निहारौ और बोले- ‘‘का, मन्दिर तें आय रहौ है गिरधारी?’’
हम्बै काका। आय तौ मंदिर तै ही रह्यौ हूँ। कायै कैं बचपन तें ही ऐसी आदत परि गई है कै बखत पै सन्ध्या बन्दन नाँय करौ तौ चैन ही नाँय परै। 
‘‘हाँ, सो तौ है भैया। अपनी-अपनी आदत की बात है। अब हम तौ ठहरे नौकरी-चाकरी बारे मानुष। उमरि भर गुलामी करी है। नौकरी नें कबऊ इत्तौ समै ही नाँय दियौ कें प्रभु भजन में मन लगतौ’’- काका नें दीनता तें कही तौ मैंने रोकि दियौ-
‘ऐसौ चै कह रहे हौ काका? उमरिभर नौकरी नें समै नाँय मिलन दयौ तौ कहा भयौ, मैंने सुनी है कै अब आपु रिटायर है गये हौ। अब तौ समै ही समै होयगौ, बस्स समाधि लगाय कें बैठि जाऔ और खूब भजन करौ। रिटायर हैबे के बाद और का काम बचै है?’
‘‘हाँ, कह तौ तू ठीक ही रहौ है गिरधारी परि भैया मैंने रिटायरमेंट के बाद फिरितें दूसरी नौकरी पकरि लई है याही तैं....।’’
‘का कहि रहे हौ काका, अब जा उमरि में दूसरी नौकरी पकरिबे कौ कारन?’ -काका की बात सुनिकें मोय अचरज सौं भयौ और मैं काका कूँ ऊपर तें नीचे तक देखिबे लगौ, - ‘हाँ, काका देखिबे में तौ अबई ठीक-ठाक से ही लगि रहे हों, परि उमरि कूँ कहाँ लै जाऔगे। अब बैठिकें खाऔ-पीऔ और भगवान कौ भजन करौ।’
‘कह तौ तू ठीक ही रहौ है गिरधारी परि भैया, अब तोकूँ कहा बताऊं, कछू कहत नाँय बनै।’ बताबत-बताबत काका की आँखिनु की कोर भीग उठी तौ मैं चैकौ। मोकूं याद नाँय परै कैं मैंनें काका कूँ कबऊ ऐसी-बैसी दीनहीन दसा में देखौ होय। अच्छी सरकारी नौकरी करत भये काका नें भौतुई सम्पन्नता भरे दिन काटे हतें। बालकनु कूँ खूब अच्छे ते अच्छे स्कूलनु में पढ़ायौ और फिरि बिनकी सादी-ब्याहु हूँ खूब अच्छे तें करे। पैसा-टका कौ कबऊ अभाव, काका पै रहौ होयगौ, ऐसौ मोय याद नाँय परै, परि रिटायरमेंट के बाद ऊ फिरि तैं नौकरी करिबे बारी जि बात कछु गरे नाँय उतरी तौ मैं पूछि बैठौ-
‘‘काका, उमरिभर की कमाई का सबु खतम है गई जो....।’
‘‘नाँय पैसा-टका की कोऊ कमी नाँय गिरधारी। मैं जि, पैसा टका के लएँ थोड़ाई करि रहौ हूँ।’’
सोई तौ, परि फिर जे दूसरी नौकरी करिबौ कछु समझ में नाँय आय रहौ काका। मैं जित्तौ हिसाब लगाय पाय रहौ हूँ बामें हूँ जि बात जँचि नाँय रही कैं कौनु सी मजबूरी नें काका कूँ फिरि तें नौकरी करिबे कूँ मजबूर करि दयौ।
पैसा टका ते हू जरूरी कई बात होय हैं गिरधारी जो मानुष कूँ जिन्दौ रखैं। कबऊ तैंनें उन गरीबनु कूं नाँय देखौ जिनपै पैसा-टका के नाम पै छल्ला हू नाँय होय, परि बु बेचिन्ता, खूब हट्टे-कट्टे से दिखाई परैं, और तौ और बिनपै सिर छुपायबे कूं एक छत तक नाँय होय, परि बु सड़क के किनारे, फुटपाथन पै ही रहत भये मस्त रहै। परि सब मानुष एक से तौ नाँय है सकैं न गिरधारी। काहू कौ हिरदय एकदम पत्थर सौ कठोर तौ काहू कौ इत्तौ संवेदनसील बनाय दियौ है कै पैर के नीचें एक चींटी हू मरि जाय तौ सोच करिबे लगें। 
हाँ, काका जि तौ बिरकुलई ठीक कहि रहे हौ परि जिन बातन कौ तिहारी दूसरी नौकरी करिबे के संग कहाँ ताल मेल बैठि रहौ है, जि बात मैं अबऊ नाँय समझि पाय रहौ।
मेरी उरझन समझत भये, काका धीरे तें मुसकाय उठे। बिनकी नजरि जानें कौन लोक में बिचरन करि रही ही। सून्य में निहारत भये बु बोले-
देख गिरधारी, सुरग और नरक सब याही लोक में होबै और अपनी-अपनी करनी कौ फल हू सब मानुषन कूं याही जीवन में भौगनौ परै जा बात कूँ तू मान्तु है कै नाँय?
मान्तु चैं नाँय हूँ खूब मान्त हूँ काका। परि अब आप नें जि दारसनिकनु जैसी बात करि दई, जाकौ ताल-मेल हूँ हमारी बा बात तें कहाँ ठीक बैठि रहौ है? मैं तौ नाँय समझि पाय रहौ।
काका की जा पहेली में मैं अपने आपु कूँ उरझौ सौ महसूस करिबे लगौ हो, याही तें मोकूं मन ही मन खीज सी हू आइबे लगी ही और हँसी-सी हू।
अरे तू हँसि रह्यौ है गिरधारी, मैं तोकूं भौतुई गम्भीर बात कहि रहौ हूँ भैया, जाकूं चाहैं तौ तू जीवन कौ रहस्य हू कहि सकै है। तू कहै तौ बताऊं? नाँय तौ जय रामजी की। 
‘‘अरे आप बुरौ मानि गये काका, छिमा करि देऊ।’’ कहत भये मैंनंे अपने दोऊ हाथ जोरि दये।
अरे नाँय गिरधारी, मेरौ जि मतलबु नाँय हो। हाँ तौ मैं कहि रहौ हो कें सुरग और नरक, सब याही जीवन में होय हैं और अपनी-अपनी करनी कौ फलु हू मानुष कूँ याही जनम में भोगनौ परै।
‘हाँ काका, जेई कहि रहे हे।’
देख गिरधारी, मेरे मइया-बापु नें मोकूं पढ़ाइबे- लिखाइबे में कोऊ कमी नाँय रखी ही। अपनी क्षमता तें हू ज्यादा पैसा मेरी पढ़ाई पै खरच करौ हो। बूं चाहें हे कें बिनकौ पूत खूब पढ़ि- लिखि जाबैगौ तौ भौतु अच्छी नौकरी  करैगौ और भौतु सुख में रहैगौ तौ अपने मइया-बापु कूं हू भौतु सुख दैबेंगौ। बिनके सारे दलिद्दर दूरि करि देगौ, फिर बु अपने छोरा और बिनके बालकनु के संग सुखपूर्वक अपनौ बचै जीवन बिताबिंगे।
‘जि तौ हर मइया-बाप की इच्छा होय है, याही कौ तौ नाम जीवन है।’’
हाँ, तू ठीक कह रहौ है गिरधारी। मौतें हू बिनकी जेई उम्मीद ही, परि में अपनेई जीवन में ऐसौ डूबि गयौ हो कैं अपनी बइअर, छोरी और छोरानु के सुख-दुःख, बिनकी सुविधानु के आगें मोकूं कछु दिखाई नाँय दैबे हो। बइअर कूँ भौतु सौ काम न करनौ परै, छोरी-छोरानु की पढ़ाई में विघन बाधा न पौहचे, बिनके रहिबे-सहिबे में कोऊ परतंत्रता न होय, बस्स, इन बातनु के आगें मइया-बापु ने हू कछु उम्मीद लगाय रखी है, बा की मोय कछू परवाह नाँय ही। या कहूँ मैं अपनी नौकरी, सहरी जीवन और परिवार में ऐसौ डूबि गयौ हो कै, मइया-बापु की भावनानु के बारे में सेाचिबे औरु समझिबे कौऊ बखत मेरे पास नाँय हो।
मइया-बापु कूँ गाम में अकेलौ छोड़िकैं मैं सहर में मौज करि रहौ हो। महीना के महीना मनीआर्डर तें मइया-बापु कूं पैसा भेजिकें में समझतु रह्यौ कै मैं बिनकीं भौतु सेवा करि रहौ हूँं। हाड़-मांस के मइया-बापु, समै-समै पै चिट्ठी-पत्रीनु तें अपनी भाबनानु कूँ प्रकट करौ करै हे और ज्यादा नाँय तौ बालकनु की छुट्टी के दिननु में ही बालकनु कूँ लैंकें गाम घूमि जाइबे की गुहार लगाऔ करें हे-
‘अरे रामहरी, तोय छुट्टी नाँय मिलै तौ बेटा, अपने छोरी-छोरानु कूँ और अपनी घरवारी कूँ ही भेजि दै भैया। बिनकूं देखिबे कौ भौतु मन करि रहौ है। तेरे छोरी-छोरानु कूं देखैं बिना भौतु दिना है गये हैं भैया।’’
मइया-बापु अपने मन के भावनु कूँ प्रकट करिबे में, चिट्ठी-पत्रीनु में अपनौं करेजौ निकारि कें धरि देऔ करै हे गिरधारी। परि बिन चिट्ठी-पत्रीनु के बारे में सोचिबौ तौ दूरि कबऊ-कबऊ तौ बिनकूं पढ़िबे तक कौ समै, मैं नाँय दे सकै हो। भलेई दूरदरसन के आगंे घन्टा-द्वै घण्टा गुजरि जाबै परि मइया-बापु की चिट्ठी पत्री कूं ध्यान तें पढ़िबे और अपने पोती-पोतीनु कूँ देखिबे, बिनकी बाल क्रीडानु कौ सुख भोगिबे की बिनकी भावनानु कूँ समझिबे कौ समै मेरे पास नाँय हो।
गिरधारी, तुलसीदास नें भगवान रामचन्द्र के बचपन कौ जो मनोहारी बरणनु- ‘ठुमकि चलत रामचन्द्र, बाजत पैजनिया’ और कबहु पलक हरि मंूद लेत हैं, कबहु अधर फरकाबै’ जैसी पंक्तिन में करौ है, बाकौ रस बु अपने पोती-पोतानु के बचपन कूँ देखि-देखि कें उठानौ चाहें, जि बात तौ वा समै मेरे दिमाग में ही नाँय आऔ करै ही। अपने पोती-पोतीनु, नाती-नातिनीनु की चुलबुली, मनोहारी बाल-क्रीड़ा मानुष कूँ जीवन जीबे की प्रेरणा, गूंगे के गुड़ की नांईं, महसूस तौ करौ जाय सकै, परि बाकौ बरननु भौतुई मुसकिल है और बा के अभाव में तिल-तिल करिकै मरिबे कौ दुःख हू ऐसौ है जाकूं कोऊ भुगत भोगी ही बताय सकै।
परि बा समै जि सारी बात मोय नाँय सूझी ही। बा समै तौ....’’ कहत-कहत अचान्चक ई काका हूक दैकें रोय परे तौ मैऊ बिनके संग भावुक ह्बै उठौ और काका कूँ धीरज बंधाइबे की कोसिस करिबे लगौ-
‘काका, जि तौ सारे जग की बात है, कोऊ तिहारी ही अनौखी बात थोड़ाई है जो इत्तौ सोच करि रहे हौ।’
हाँ, तू ठीक कह रहौ है गिरधारी। सारी दुनिया की जि बात है परि सबकूँ समझ तबई आबै जब समै बीति जाबै है। सब तबई पछताबैं हैं जब चिड़िया सारौ खेत चुग जाबै है। परि फिरि पछताइबे तें कछू नाँय होय बीतौ समै फिरि नाँय लौटै।
‘‘जेई बात है काका’’- मैं समझि गयौ काका कौन सी पीड़ा तें गुजरि रहे हैं। काका के दोऊ छोरानु कूं मैंनें देखौ है। छोरी तौ अपनी ससुराल में होयगी परि दोऊ छोरा खूब पढ़ि-लिखि गये हैं। भौतु अच्छी नौकरीनु पै लगि गये हैं। ब्याह हू दोनौनु कौ है ही गयौ है। सियाने होतई, घोंसला छोड़िकें दोऊ फुर्र है गये हैं। याही बात की पीड़ा काका कूं मथि रही है, जो हूक दैकें रोय परे हैं...। परि रिटायरमेण्ट के बादऊ नौकरी करिबे बारी बात मेरी समझ में अबऊ नाँय बैठि रही ही सो पूछि बैठों-
‘काका, छिमा करिऔ, मैंनंे आपु कूं कहाँ उरझाय दियौ। फिरऊ बुरौ नाँय मानौ तौ फिरितें बाई बात कूं दुहराय दऊँ- कैं मेरी समझ में अबऊ जे नाँय आयौ कै इन सब बातनु कौ तिहारी नौकरी तैं कहा सम्बन्धु है?’
‘है गिरधारी, सम्बन्धु है। देखि तू घर के सिगरे लोगनु कूँ जानै। बड़ौ छोरा अमित एक अच्छी सी फर्म में गुडगांव में लगि गयौ है सो भैया बु अपनी बइअर और बालकनु कूँ लैकें गुड़गांव चलौ गयौ है। छोटे छौरा सुमित की मुम्बई में लगि गई है नौकरी। छोरी जा की अमानत ही ब्हाँ चली गई।
अमित-सुमित की नौकरी लगी तौ कैऊ-कैऊ लाख रुपैया मिलिबे की बात सुनिकें अचरज भरी खुसी मिली हती और मन फूलौ नाँय समाय रहौ हो।
मेरे रिटायर हैबे पै छोरानु नें आयकें अच्छी सी पार्टी दई हती। खूबई अच्छौ लगौ हो मोकूं। बाके कछू दिना बाद छोरी तौ चली गई अपनी सासुरे कूं और अमित-सुमित अपने बाल-बच्चानु कूं लैकें चले गये अपनी-अपनी नौकरीनु पै।
थोरे से दिनान तक तौ सबु ठीक-ठाक चलौ। खूब आराम लगौ। परि फिरि बच्चानु के बिना सूनौ घर खाइबे कूं दौरिबे लगौ। नौकरी पै रहत भये तौ कछू पतौ ही नाँय चलौ हो। भोर में घर तें निकसि गये और संझा भये लौटे। परि अब तौ पूरे दिन घर में परै-परै पोती-पोतीनु की किलकारी और नटखट-चुलबुली बाल क्रीड़ा रहि-रहिं के याद आबै।
एक दिन मन नाँय मानौ तौ दोऊ छोरानु कूं फोन करौ परि बिननें जबाबु दियौ- ‘‘ बालकनु की पढ़ाई कौ हर्जा होबै है। अब बु गुल्ली-डंडा खेलत-खेलत पढ़ि लैबे बारी पढ़ाई तौ है नाँय, अब तौ ऐसे-ऐसे कोर्स हैं कैं सिर चकराबै। फिरि हजारौं रुपैया पैकेज बारी जि नौकरी ज्यादा छुट्टी नाँय दैबें। अब आपु रिटायर है गये हौ तौ अकेले रहिबे की आदत तौ डारनी ही परैगी।’’ सुनिकें मोय अपने बीते समै की याद आय गई। अपने मइया बापु के संगई मैंने कब अपने बालक भेजे हे सो अब अपने छोरानु तें जि उम्मीद लगाऊं मैं। बस मैंने घर की सूनी-सूनी दीवारनु कूं देखत भये, विगत कूं याद करिकें रोयबे तै अच्छौ समझौ कैं फिरि तैं कहूं व्यस्त है जाऔ।
ठीक ही कहि रहे हो काका, परि में एक बात कहनौ चाहूं- आपु तौ इस लायक हे कें दूसरी नौकरी लगाय लई। परि जे का याकौ सही हल है? पीढ़ी दर पीढ़ी बूढे़ मइया बापु कब तलक ऐसौ दुःख भोगिबौ करिंगे? आखिर जे दिना तौ सबई के जीबन में आबैं है तौ फिर चैं नाँय बीते भये तें कछु सबक लैकें नई पीढ़ी बा में कछु सुधार करि ले और बीच कौ मारग अपनाबै?
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समै कौ चक्र

साम को समै हो मैं सन्ध्या बन्दन कूं जाइबे ही बारौ हो कै सोमजी कौ फून आय गयौ- ‘भैया गिरधारी, बजार की लग कूं जाऔ तौ घर होत भये निकरि जइयौं।’
मैं सोचिबे लगौ, सौम जी कूँ ऐसौ कहा कामु परि गयौ मोसूं जो या समै याद करौ है। है सकै कोऊ नाते रिस्तेदार आय गयौ होय, बाकी खातिरदारी कूँ कछु मंगाबत होंय। परि ऐसौ तौ आजु तलक कबऊ भयौ नाँय कें बाहर तें आइबे बारे की खातिरदारी के लियें बाही समै कछु मंगायौ जाय। सोम जी नें अपने जीवन कूँ जा तरियां तें रखौ है, कें समै परे पै घर में कछु नाँय मिलै जि बात तौ है ई नाँय सकै। पूरे मौहल्ला भर की जरूरतन पै काम आइबे बारे के घर में ऐसौ समै आय जाय, है ही नाँय सकै। अब नौकरी छोड़ि दई है तौ जाकों मतलबु जि तौ नाँय है कैं ऐसौ समै आय जाबै। अरे अधिकारी के पद तें सेवानिवृत्त भये हैं तौ अधिकारी जैसे ही रहिंगे। जरूर कछु और बात होयगी।
सोचत भये मैं सोमजी के घर की ओर कूं चलि दियौ। थोरी देर में सोमजी के घर के सामनें पहुँचै तौ सोमजी द्वार पै ही खड़े मिलि गये। रामा-किसना के बाद मैंने पूछि लई-
‘‘हाँ दाऊ, कैसें याद कियौ जा अकिंचन कूँ?’’
‘अरे गिरधारी, जे कहा कहै है, तू तौ भौतु समरथ है, अकिंचन काहे कूँ है।’
‘‘अरे नाँय दा, सब आपकी किरपा है। बताऔ, सेवा बताऔ, मोकूँ कैंसे याद कियौ?’’
‘बात जे है गिरधारी कें बाजार की लंग कूं जाय रहौ होय तौ भैया ब्रेड और बटर के पैकिट लाय दैयो।’
‘ब्रेड और बटर कब तें खाइबे लगे दाऊ? मैं तौ आपके म्हौड़े तें ब्रेड कौ नामु ही पैहली बार सुनि रह्यौ हूँ। आपु ठहरे खालिस घी कौ ताजौ-ताजौ भोजन करिबे बारेे। का कोऊ आय गयौ है या भौजी कहूँ बाहर गई हतैं?’’
नाँय गिरधारी, ना तौ तेरी भौजी कहूँ गई हतै और ना ही कोऊ आयौ भयौ है। बात जि है गिरधारी कें तेरी भौजी कौ और मेरौऊ स्वास्थ्य थोड़ौ नरम सौ है आजु ... याही तें....’ कहत-कहत सोमजी की आँखिनु की कोर भीगि गईं औरु गलौ रुंधिबे लगौ तौ मैं चैंकि उठौ। मोकूं यादि आयौ कें भौजी की तबियत नरम हैबे तें घर के भौजन कौ कहा मतलबु है। घर में द्वै-द्वै छोरानु की घरबारी हैं। छोटे छोरा कौ ब्याह तौ अबई द्वै साल पैहलेई करि कें लाये हते और बड़े बारे छोरा पे तौ द्वै तीन बालक हू हैं। कहा दोऊ छोरानु की घरबारीनु कूं एक संगई भेजि दियौ दाऊ नें कहूँ या छोरानु के संग कहूँ निकरि गईं दोऊ?
मैं सोच में डूबौ ही जाय रहौ हो। सोम जी नें जबतें जा काॅलोनी में अपनौ घर बनायौ है तबतें ही मैं बिनें अच्छी तरियां तें जानूँ हूँ। पूरे नबावी ठाट-बाट तें रहिबौ औरु आइबे बारेनु कौ पूरौ आदर सतकार करिबौ। द्वै मीठे बोल बोलिबौ। जे कछू ऐसे गुण हैं सोमजी के जिनते आइबे बारौ चुम्बक की तरियाँ बिनकी ओर खिंचैई चलौ आबै है। बड़प्पन कौ दिखाबौ करिबौ तौ जैसे सीखौ ही नाँय। बिनके व्यौहार कूं देखिकें कोऊ नाँय कह सकें कि इत्ते बड़े पद पै कामु करै हैं कै जिनके एक इसारे पै बड़े तें बड़े काम चुटकिनु में पूरे ह्बै जाबै हैं।
एक दिना मोय सोंम जी के दफ्तर जाइबे कौ मौकों मिलौ। इत्ते बड़े भवन में सोमजी कौ दफ्तर कै मैं तौ बा भवन कूँ भौंचक सौ देखत रह गयौ। फिर भीतर आइबे लगौ तौ द्वै बन्दूकधारीनु नें रोकि दियौ। मैंने सोम जी कौ नामु लियौ तौ बन्दूकधारी एकदम तें नरम परि गये। तुरतई फून घुमाऔ। सोमजी नें बिनकूं, मोय अन्दर भेजि दैबे कौ आदेस दियौ। मैं अन्दर जाइबे लगौ तब तक तौ कहा देखूं कें सोमजी खुद ही सामनें आय गये, मोकूं लैबे। अब बताऔ, इत्ती भलमनसाहत आजु के जमाने में कहाँ बची है काऊ में। खैर, सामनें ही लिफ्ट में घुसाइकें छिनभर में जानें कित्ती मंजिल ऊपर  पौहचें गये मोकूं लैकें। मैंनंे नीचे कूं झाँकौ तौ पतौ चलौ। सड़क पै भागत भई बसें ऊपर तें देखिबे पै छोटी, खिलौना सी लगि रही हतीं। 
कित्तौ सुन्दर दफ्तर हो सोमजी कौ, बड़ी सी सींसा की मेज, बापै सुन्दर से परदा। मैं तौ जि सबु भौचक सौ देखत ही रहि गयौ। सोमजी नें प्यार तें अपने सामनें बैठायौ, कामु पूछौ और तुरत ही एक सेवक कूँ बुलायौ और बाकू मेरे काम के बारे में पूरी तरियां समझाय कें कहूं भेजि दियौ। थोरी सी ही देर में बु आदमी मेरौ कामु करबाइकें लौटि आयौ।
जा काम के लैं में महीना-महीना चप्पल चटकात भये इतैे-उतैे दफ्तरनु में घूमौ करौ हो फिरि हूँ काहू नें नाँय करिके दियौ, बाही कामु कूं सोमजी नें चुटिकनु में कराय दियौ फिरऊ नैक सौ हू गुमान नाँय। मैं तौ मन ही मन नतमस्तक ह्बै गयौ सोमजी के सामनें। इत्तौ बड़ौ    अधिकारी और रामजी नें नैंक सौ हू घमण्ड नाँय दियौ। बाह रे ऊपर बारे, तेरी हू लीला अपरम्पार है, कोऊ-कोऊ तौ कछू भी नाँय होबै फिरहू घमण्ड के मारें निकरौ ही परै है और सोमजी कूँ देखौ, कैसों सोम सौ हिरदै दियौ है ऊपर बारे नें।
हरसाल होरी के त्यौहार पै, छोटे-बड़े सबतें एैसे मिलै हैं कें जो एक बार मिलि लियौ, सौम जी के स्नेह कूँ जिन्दगी भर नाँय भूलि पाबै। छोरानु के ब्याहनु में ऐसे प्रेम तें बुलायौ सबकूँ कें सब प्रेमरस में डूबि गये। 
जैसे सोम जी बैसी ही भौजी हू। दोऊ छोरानु की घरबारी जब घर कौ कामु निपटाइबे में लगी होबै तौ भौजी हू बिनकौ हाथ बटाइबे में पीछे नाँय रहैं कबऊ। छोरानु की घरबारी मना करै तौ भौजी धीरे तें मुसकाय दैबे ही- ‘‘अरी जब तलक मेरे हाथ पाम चलि रहे हैं’ तब तलक तौ कछु करि लैंन देऊ। फिरि तौ सारौ कामु तुम दौऊन कूँ ही करनौ है।
‘अरे गिरधारी, भैया कहाँ खोय गयौ? मैं कित्ती देर तें आवाज दै रह्यौ हूँ।’
दाऊ की आवाज सुनिकें मैं जौ सोबत तें जागि उठौ। हड़बड़ाय कें इत्तौ ही बोलि पायौ-
‘दाऊ, में तौ बड़ी दुबिधा सी महसूस करि रहौ हूँ अपने आपु में।’
‘कैसी दुबिधा में गिरधारी?’
‘जेई कै द्वै-द्वै छोरानु की घरबारी घर में होत भये, दाऊ कूँ बाजार तें ब्रेड मंगबाइबे की जरूरत .... कछू समझि नाँय पाय रहौ मैं।’’ - मैंने निरीहता तें सोम जी के म्हौंडे़ की लंग कूँ निहारौ।
मेरी बात सुनिकें सोमजी कौ म्हौड़ों पीरौ सौ परि गयौ फिर तुरंत ही बात कूं संभारत भये से बोले-
‘‘बात जि है गिरधारी कें छोटे छोरा की घरबारी तौ अपने मायके चली गई है परसौ, और बड़े की, अपनी एक रिस्तेदारी में। नाहीं तौ तू तौ जान्तु ही है, दोऊ छोरानु की घरबारी ऐसी लक्ष्मी है कें तेरी भौजी कूँ हाथ तक नाँय लगाबन दैबें हैं घर के काम तें।’’
‘सोई तौ मैं कहूँ कें भला द्वै-द्वै छोरानु को ब्याहु है जाइबे पैऊ, ऐसे भले मानुष कूं जा उमरि में बाजार की ब्रेड खानी पऱै, जानैं अपनी जिन्दगी में कबऊ ब्रेड नामु हू नाँय लियौ होय तौ फिरि कहा मतलबु भयौ द्वै-द्वै छोरानु कौ। का याही समै के लें पालि-पोसि कें बड़े करे हते कै बुढ़ापे में मैया-बापू कूँ पूछै हू नाँय।
अच्छा दाऊ, मैं चलूं पैलें आपकूं सामान लैंकें दै जाऊँ फिरि सन्ध्याबन्दन कूं जानौ है, हरिराम मेरी बाट जोहि रहौ होयगौ।
सन्ध्याबन्दन के बाद मैं अपने घर आय तौ गयौ परि ना जानें चैं मेरौ ध्यानु सोमजी की आँखिनु की भीगी कोरनु में उरझि-उरझि जाय रहौ हो। मोकूं जा हालत में देखि, घरबारी पूछि बैठी-
‘‘कहा बात है जी, आजु कछु खोये-खोये से चैं लगि रहे हौ?’’
‘अरी भगबान, ऐसी तौ कोऊ बात नाँय है।’- मैंने बात कूं टारिबौ चाहौ।
‘‘नाँय मैं मानि ही नाँय सकूँ। इत्ते बरस तें तिहारे संग हूँ, जरूर कोऊ ऐसी बात है जो तिहारे मन में उमड़ि-घुमड़ि कें उथल-पुथल मचाय रही है। इत्ते बरसनु में आज तक कबहू नाँय छिपायौ हमनें एक-दूसरे तें तौ का अब जा बुढ़ापे में छुपाबिंगे?’’
‘अरी भागबान, तू तौ मेरे भीतर-बाहर की सब कछू जानि लैय है, तोतें मैं कहा छुपाय सकूँ हूँ। सुनि बात जि है कैं मैं आजु सोमजी के घर गयौ हतो। तू तौ उनके घर-परिवार तलक कूँ अच्छी तरियां तें जानें है। इत्ते भले आदमी आजकल जा कलजुग में कहाँ देखिबे कूँ मिलैं हैं।’
‘‘हाँ, सो तौ बिरकुलई ठीक कहि रहे हौ। फिरि का भयौ?’’
‘भयौ का, सोमजी नें तौ मोकूं कछू बात नाँय बताई, अपने दोऊ छोरानु की और उनकी घरबारीनु की भौतुई तारीफ कर रहे हे, परि न जानें चैं मोकूँ अन्दर ही अन्दर कछु दुःखी से जानि परे बु।’
‘‘अच्छौ, जि बात है तौ आपु चिन्ता मती करौ। कल्लि ही सारौ भेद पतौ करिकें बताय दुंगी। चलौ अब कछु खाय-पी लेऊ।’ - जमुना की माँ नें निहोरौ करौ तौ मैं जैसे बैठि गयौ। परि रात कूूँ हू सोम जी के निरीह से म्हौंड़े कूँ मैं नाँय भुलाय पायौ। जरूर ही कोऊ ऐसी बात है जातें सोमजी भीतर ई भीतर टूटि रहे हैं। सोमजी और भौजी के ब्यौहार नें मोकूं ही नाँय, पूरे मौहल्ला-पड़ौस कूँ अपने आकरसन में ऐसौ बाँधि रखौ है कैं बिनके दुःख में सब कोऊ अपने कूँ दुःखी समझैं हैं। 
दूसरे दिना घरबारी नें अपने खुफिया सूत्रनु तें जो बात आय कें बताई बाय सुनिकें मेरी संका सही सिद्ध है गई।
सोम जी के सेवानिवृत्ति के बाद कछू दिना तक तौ सब ठीक-ठाक चलौ परि फिर घर के भीतर कलह हैबे लगी। छोरानु की घरबारीनु कूँ दोऊ जने बोझा और बिनकी कमाई कूँ खरच करिबे बारे लगन लगे कै सोमजी नें घर की बात घर में ही दबी रहै या तें दोऊ छारोनु कूँ मकान कौ ऊपर बारौ हिस्सा दै दयौ। अपनौ-अपनौ कमाऔ, अपनौं-अपनौं खाऔ।
अलग-अलग रह कैं दोऊ छोरानु की घरबारी तौ है गईं मस्त। बड़ी नें एक स्कूल में पढ़ाइबे कूँ जानौ सुरु करि दियौ और छोटी नें क्लब और सहेलिनु के ह्याँ।
पहलें तौ दोउनु नें एक-एक महीना बाँटि लियौ। एक महीना छोटी बारी सोमजी और भौजी कौ भोजन बनाबैगी और दूसरे महीना बड़ी बारी। फिर धीरे-धीरे भोजन बनाय कैं दैबों हूँ बोझ लगन लगौ बिनकूं तौ भौजी नें ही अपनौ कामु फिर तें सम्भाल लियौ। का करतीं कैसें समझातीं बहुअन कूँ कै उमरि हूँ कच्छू होबै है। बुढ़ापे में तौ पैहले सी ताकत नाँय रहै।
छोरा और बिनकी घरबारी सोचि रही हैं कैं बु अमरितु चखि कैं पैदा भये हैं, कबऊ बूढ़े नाँय हुंगे। परि समै काहू कूँ नाँय छोड़े। कल्लि कूँ जब बु सब बूढ़े हुंगे और बिनके बालक हूँ, बिनके संग ऐसौ ही करिंगे जैसौ बु करि रहे हैं सोम जी और भौजी के संग, तब? तब का, तब पछताये तें कहा होयगौ, तब तक तौ चिड़ियाँ खेत चुगि चुकी होंयगीं।

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सोलह आना सच

भौतु दिननु के बाद आजु अपने गाम कूँ आयौ तौ बचपन के सारे संगी-साथिनु तें मिलिबे कौ मनु करौ।
थारी में परोसौ भोजनु जीमिकें, मइया तैं पूछि कें मैं गाम में घूमिबे कूं निकरि परौ। 
सबतें पहलें नरेन्दर के ढिंग कूं चलौ। बचपन तें ही संग पढ़िबे-लिखिबे के कारन नरेन्दर कौ लगाव कछू ज्यादा ही है। दूसरे नरेन्दर की आदत है कै बु गाम भरे की ही नाँय, अपने आस-पास के गामनु तक ही खबरि रखौ करै है। कौन के घर कब कौन सौ काम हैबे बारौ है, कब कौन कौ ब्याहु है, कौन कौ सम्बन्ध कहाँ ते, तै भयौ है, कौन सुख-चैन की बंसी बजाय रहौ है और कौन दुःख भरे दिन काटि रहौ है, जि सारी खबर नरेन्दर के ढिंग पहुँचतई मालुम परि जाबै हैं, याही तें सबतें पहलें, में नरेन्दर के ही ढिंग जाय पौहचों।
रामा-किसना के बाद नरेन्दर नें मोकूं मूंढ़ा पै बैठायौ और फिर बोलौ- ‘‘और सुनाओं, कहा नई खबरि है?’’
नरेन्दर की बात सुनिकें मैं धीरे ते मुसकाय दयौ-
‘अरे नरेन्दर मैं तौ ठहरौ बाहर रहिबे बारौ। भौतु-भौतु दिनानु में गाम आनौ होबे है। परि तू तौ याही ठौर, गाम में रहौ करें है, तू बता कहा नई बात है?’
बस्स मेरौ इत्तौ पूछिबों हो कें नरेन्दर नें बातनु की गठरी खोलि डारी। एक-एक करिकें सारे संगी-साथिनु के, रिस्तेदारनु के, जान-पहचान और गाम, घर सबनु के बारे में नरेन्दर हुमसि-हुमसि कें बतायबे लगौ कें या बेरि गाम में परधानी के चुनाबन में ऐसौ पासौ पलटौ कंे सारे तीस मारतेखान कूँ पछारिकें परसादीलाल परधान बनि गयौ और बनतौ हू चैं नाँय बा नें पूरे गाम भर के लैं भौतु अच्छे-अच्छे कामु करे हते। परधानी कौ चुनाव तौ अब भयौ है परि परसादीलाल तौ काऊ कौ कोऊ कामु परौ, चलौ परसादी लाल पै और परसादी लाल ऐसे हैं कै ना काहू सौं कोऊ स्वारथ ना इच्छा, बस्स जाकौ कामु परौ, अपनी पूरी ताकत झौंकि कें बाकौ काम पूरौ कराय दैबे हो, फिरि चै नाँय परधान बनतौ, ऐसौ आदमी। तुमई बताऔ भैया?’’ नरेन्दर इत्तौ बोलिकें मेरे म्हौड़े कें लंग कूँ देखिबे लगौ।
‘तू ठीक कह रहौ है नरेन्दर, भलमनसाहत की हर कोऊ कदर करै है औरु फिरि चन्ट चालाकनु की एकाधबार तौ चलि जाबै है, काठ की हांडी बेरि-बेरि नाँय चढ़ौ करै। परसादी लाल नें गाम-मौहल्ला बारेनु कूँ कछु करिकें दिखायौ हो तौ बिनकौ हू फर्ज बनै है कैं बु ऐसे ही आदमी कूं चुनें।’’
‘जै तौ है परि आजु-कल्लि चुनाबनु में निष्पक्षता रह ही कहाँ गई है? आजु कल्लि तौ धन-बल औरु छल के जोर तें सही कूँ गलत औरु गलत कूँ सही कराय लैबें हैं। निकम्मे, कामचोर औरु गुण्डा अपनी गुण्डागिरी तें जनता कूँ धमकाय कें अपने पक्ष में वोट डरवायबे की पूरी कोसिस करैं हैं। कैऊ बरस पहलें गाममें भये परधानी के चुनाबनु कौ बाकया याद आबत ही मेरे म्हौ में मानौ नीम के पत्तनु कौ अरकु निचुरि गयौ। नरेन्दर हूँ समझि गयौ कै मोकूँ कौन सौ बाकया याद आय गयौ है, सो नरेन्दर बोलौ-
‘‘हाँ, तुम ठीक कह रहे हौ भैया। परि अबकी बेरि जु भयौ है ऐसौ आजु तलक कबऊ नाँय भयौ, दूध कौ दूध और पानी कौ पानी करिकें धरि दयौ गाम बारेनुु नें।’’
‘चलि भलौ भयौ, तैनें एक भली बात सुनाई गाम की। और सुना, गाम के पुराने संगी-साथिनु के का हाल-चाल हैं? ‘ओमवीर, धर्मवीर, राजेन्दर सबके बालकनु के का हाल-चाल हैं?’
‘सिगरे संगी-साथी मौज में हैं। ओमवीर अपने मइया बापु तें जमीन जायजात कौ बंटबारौ करिकें काॅलोनी में रहिबे लगौ है। राजेन्दर नंे अपने एक-एक छोरा-छोरी कौ ब्याहु करि दीनों है। धर्मवीर नें हू अपनी छोरी कौ ब्याह तै करि दीनौ है।’
‘‘अरे, सबनु के छोरा-छोरी इत्ते बड़े है गये? समै कैसों फुर्र-फर्र करिकें उड़ौ जाबै, पतौ ही नाँय चलै।’’ - मैंने नरेन्दर की ओर कूं अचरज तें देखौ।
हाँ, भैया, समै काहू के रोकें थोड़ौई रुकै। बु तौ एक पल कौ हू बिसराम नाँय करै। बस्स पल-पल करिकें चलौ ही चलै और देखत ही देखत राजा कूं रंक और रंक कूं राजा बनाबत भये दौड़ों करै है। 
अब बा कूं देखि लेऊ, तिहारौ सहपाठी सुरेन्दर, कैसों उलीचै करै हो धन कूं। आज बाके द्वै बखत की रोटीनु के हू लाले पड़े भये हैं।
सुरेन्दर के बारे में नरेन्दर की बात सुनिकें मोय धक्का सौ लगौ। बचपन के संगी-साथिनु में सुरेन्दर सबतें जादा रहीसी ठाट-बाट तें रहौ करै हो।
चैधरी देवी सिंह कौ धेवतौ सुरेन्दर, मेरे बचपन कौ लँगोटिया यार हो। चैधरी देवी सिंह गाम की जानी-मानी हस्ती हे। लम्बौ-चैड़ौ सौ अहातौ, 6-6 तगड़े बैलनु की जोड़ी, गाय-भैंस और खेती बारी। घर में और खेती में काम करिबे बारे नौकर-चाकरनु की कोऊ गिनती ही नाँय ही।
सुरेन्दर मेरे संगई पढ़ौ करै हो। खूबि खुलिकें खरच करै हो। मैं अपने घर की गरीबी के कारन, छोटी उमरि में ही, उमरि तें ज्यादा सयानों है गयौ हो, याही तें सहपाठी के नाते मैं सुरेन्दर कूं कबऊ-कबऊ समझाऔ करै हो कें भैया, रुपैया-पैसा खूब हैबे कौ जे मतलबु नाँय है कै बाकूं खूब खरचै। जहाँ जरूरत होय व्हाँ ऊं और जरूरत नाँय होय व्हाँ ऊ। या तरियाँ तौ लक्ष्मीजी रुठि जाबैगी। ठीक तें खरच नाँय करिबे बारे भौतेरे कंगला होत भये देखे गये हैं। परि सुरेन्दर डूबौ भयौ हो धन के मद में। घरमें अकूत धन होय और मानुष कूँ मद ना होय, जे कैसें है सकै। मद तौ काऊ बिरले कूँ ही नाँय है सकै, जापै प्रभु की किरपा होय।
भौतु समै तें सुरेन्दर के बारे में कोऊ खबरि नाँय मिली ही सो मैंने नरेन्दर तें सुरेन्दर के बारे में पूछी।
नरेन्दर ने मोकूं ऊपर तें नीचे तलक निहारौ फिर एक लम्बी सांस लेत भये बोलौ-‘कहा बताऊँ, सुरेन्दर की हालात देखि-देखि कें मोकूं लड़कपन कौ सुरेन्दर, बाके ठाठ-बाट और रुपैया-पैसा कौ उलीचिबौ याद आय जाबै है और बाही के संग, याद आय जाबै हैै तिहारी बातें, बिनकूं तुम सुरेन्दर तें कहौ करैए, कै सुरेन्दर, रुपैया-पैसा कूं ठीक तें खरच न करिबे बारे, भौतेरे कंगला होत भये देखे हैं या तें धन कौ दुरुपयोग मत करौ भैया?’
नरेन्दर इत्तौ कहिकें चुप्प है गयौ। बाकी बातनु तें इत्तौ तौ अंदाज लगि ही रहौ हो कै सुरेन्दर कौ समै बदलि गयौ है। धन के दुरुपयोग ने बा की माली हालत कूँ गड़बड़ाय दियौ है। फिरि हू मैंने नरेन्दर कूँ कुरेदौ-
‘‘सुरेन्दर के बालकनु के सादी-ब्याह तौ है गये हुंगे ?’’
‘हाँ, द्वै छोरानु कौ ब्याह है गयौ है। एक छोरी कौ ब्याह अबई तै करौ हो परि रिस्तौ टूटि गयौ।’
‘‘रिस्तौ टूटि गयौ! चैं ?’’- सुनिकें मोय अचम्भौ भयौ।
‘पहलें जब रिस्तौ तै करौ हो तौ बिनकौ छोरा बेरोजगार हो, याही तैं छोरा के मैया बापु नें सोची होयगी कें चलौ, छोरी बारेनु पै इत्तौ जादा नाँय है दैबे कूं तौ कोऊ बात नाँय, छोरा की भामरि तौ डरि जाबेंगी। परि कछू दिना बाद ही छोरा की नौकरी लगि गई तौ बिननें सोची होयगी कें अब तौ छोरा कौ अच्छौ ब्याह है जाबैगौ। बस्स, फिरि काओ, छोरा बारेनु नें सीधे तरियाँ तौ ब्याह करिबे तें मना नाँय करी, बोले के छोरा जिद करि रहौ है कि बूँ अपनौ ब्याह तीन साल बाद करैगौ। अब तुमई बताओ भैया, तीन बरस तक इन्तजार के बाद बु पूरी तरियां मना करि देय तौ छोरी की उमरि तीन बरस और बढ़ि जाबैगी। तब सुरेन्दर इतै कौ रहैगौ न उतै कौ। याही तें सुरेन्दर ही खुदि जायकें छोरा बारेनु कूं मना करि आयौ।’
सिगरी बात बतायकें नरेन्दर नें मेरे म्हौंड़े की ओर कूं देखौ।
‘‘हाँ, जितौ तू ठीक ही कहि रहौ है नरेन्दर। परि एक बात बता भैया, का सुरेन्दर की इत्ती सारी धन-दौलत सब खतम है गई जो ह्याँ तक नौबत आय गई?’’
मेरी जिज्ञासा जानिकें नरेन्दर नें हांमी भरी, - ‘‘तुम ठीक कह रहे हौ भैया, लक्ष्मी, चंचला होय है। जे काहू एक जगै नाँय ठहरौ करै। सुरेन्दर नें धन के मद में कबऊ परवा ही नाँय करी और हाथनु तें धन कूँ उलीचिबौ करौ। याही तें जे हालत है गई। अब एक जगै तें रिस्तौ टूटि गयौ तौ मारौ-मारौ फिरि रहौ है। परि छोरा बारेनु के दिमाग सातमे आसमान पै चढ़े भये हते। छोरा बारे, छोरी बारे के पैसा-टकान तें ही रातों-रात लखपती बनि जानौ चाहंै। नकद रुपैया पैसा हू देऊ और सिगरौ सामानु हू। जहाँ कहूँ हू सुरेन्दर बात चलाबै हैं, लैबे-दैबे की बात आबत ही सब कन्नी काटि जाबै हैं। अब कहाँ तें लाबै सुरेन्दर। अब बा के पास इत्तौ-धन दौलत नाँय बचै कें बु खूबई ठाट-बाट तें छोरीनु कौ ब्याह करि सकै।
‘‘नरेन्दर, जे दहेज कौ कोढु कबऊ खतम होयगौ के नाँय।’’
‘खतम कहाँ तें होयगौ, तुमही बताऔ भैया, जापै दैबे कूँ हतुऐ बु सारी दुनियाँ कूँ दिखाइबे के लैं जाने कहा करि डारनौ चाहै है, गाजे-बाजे, कार-मोटर सबई में खूब ही पैसा उलीचै करै है। वा की देखा-देखी औरनु के हौसले बढ़ें हैं और बु म्हौड़ों फारिकें छोरी बारेनु की धन दौलत तें एक ही दिना में लखपती बनि जानौं चाहें। अब भले ही काऊ पै दैबे कूँ होय या करज करिकें दे।
सरकार हू दहेज रोकिबे के झूठे-सच्चे तरीके अपनाऔ करै है, कोऊ ठोस कदम तौ उठाबै नाँय जो काहू की हिम्मत ही नाँय परै दहेज लैबे-दैबे की।
तू ठीक कह रहौ है नरेन्दर परि खाली सरकार कूँ दोसु दैबों ठीक नाँय है भैया। सरकार कोऊ घर-घर जायकें थोड़ेई झांकिबौ करैगी? दहेज कौ कोढ़ तौ तबई खतम होयगौ जब हम अपनी-अपनी दुहरी सोच कूँ बदलिंगे। छोरी कौ ब्याह करिबे के लैं तौ हम दीन-हीन बनि जाबैं हैं और अपने छोरा कौ ब्याह तै करत भये बढ़ि-चढ़ि कें नीलामी करौ करै हैं छोरा की। तब सब भूलि जाबै हैं कै छोरी बारौ इत्ती धन-दौलत कहाँ ते लायकें लुटाबैगौ?
तिहारी बात सोलह आना सच है भैया।
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समै की बलिहारी

चार दिना तें है रही बूंदाबांदी नें गरमी की तपन कूँ कम करिकें मौसम कूँ सुहानौ करि दयौ है पर रनवीर के हिय में धधकि रही तपन कूँ जि मौसम की बूंदा-बांदी हूँ ठण्डौ नाँय करि पाय रही। छोरा और बा की घरबारी उर्मि के आइबे की सुनिकें ही बा के हिय में ऐंठन सी सुरु है गई है। बिनके आइबे पै घर में है बे बारे महाभारत की कल्पना तंे ही रनवीर कौ खून सूखिबे लगौ है।
कैसी लीला है ऊपर बारे की हू। मानुष सोचै हैं कै बंस कूँ बढ़ाइबे के लयें एक छोरा को हैबो जरूरी है, परि बड़ौ है कें बु मइया-बापु कूँ सुख हू देगौ, जे जरूरी है का?
जा छोरा के जनम के लयें कैसे-कैसे टंट-घंट औरु पूजा पाठ करे हते रनवीर नें। एक के बाद एक कैऊ छोरीनु के जनम लैबे पें रनवीर एक छोरा की चाहत में सूखिबे लगौ हो। जा काहू नें जो कछू बतायौ बुई करौ हो बानें, और जब ऊपर बारे नें रनबीर की सुनि लई तौ बु फूलौ नाँय समायौ हो। अस्पताल तें लैकें घर तक सबकूँ मिठाई बांटिबौ करौ हो।
अपने इकलौते छोरा की सिगरी बातनु कूँ बानें एक डायरी में लिख राखौ हो। कब छोरा नें बोलिबौ सुरू करौ, कब पहली बार ठाड़ौ भयौ और कब घुटरुन चलिबौ सुरु करौ। छोटी तें छोटी और बड़ी तें बड़ी, सिगरी बातनु कूँ बु अपनी डायरी में नोट करौ करै हो। इत्तौ ही नाँय बु अपने छोरा के हर महीना फोटू हू खिचाऔ करै हो। फोटूनु के नीचे, फोटू करबायबे की तारीख के संग-संग बा तारीख कूँ कित्ते महीना या बरस कौ है गयौ छोरा, जि बात हू लिख दई हती।
पंडित जी नें छोरा कौ नाम सुघड़पाल धरौ हो। बाके रूप रंग कूँ देखिकें रनवीर फूलों नाँय समाबै हो। सुघड़पाल के गोल-मटोल हाथ-पामनु में रनवीर नें चाँदी की नजरिया और पैंजनियां, पहनाय दई हतीं और घुंघरारे केसनु में मोरपंख बांधि कें जब रनवीर की घरबारी सुघड़पाल के गाल पें नजर की कारी बिन्दी धरौ करै ही तौ बाकौ रूप और ही निखरि आबै हो। कमरि में चाँदी की कौंधनी और पैरनु में पैंजनियां बजाबत भये जब सुघड़पाल ठुमकि-ठुमकि कें चलौ करै हो तौ रनवीर कूँ सारे जहान की धन दौलत मिलि जाओ करै ही और बु सुघड़पाल कूँ एकटक निहारिबे लगै हो।
‘‘ठुमकि चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां’’ कौ रूप बाके सामनें उपस्थित है उठै हो।
धीरंे-धीरें सुघड़पाल बड़ौ हैबे लगौ तौ रनवीर नें बाकूँ अच्छे तें अच्छे स्कूल में दाखिला करायौ। पढ़ि-लिखि कें भौतु बड़ौ आदमी बनैं, फिरि अच्छी सी नौकरी लगि जाय तौ सुघड़पाल कौ ब्याहु करि देगौ बु। घर में बाकी घरबारी सब की सेवा-टहल करैगी और फिर सुख तें दिन बीतिबौ करिंगे। इनही कल्पनानु में रनवीर के दिन-रात बीति रहे हे। सुघड़पाल हू तेजी तें जबान पट्ठा है बे लगौ हो। पढ़ाई पूरी होंतई बाके ब्याह बारे आइबे लगे परि जौ लों छोरा अपने पामनु खड़ौ नाँय है जाबै तौ लों ब्याहु करिबे कौ मतलबु, छोरा कूँ धरमसंकट में फंसायबौ है, ऐसौ रनवीर सोचै करै हो, सो बानें ब्याह कंू आइबे बारेनु कूँ थौरो धीरज धरिबे की कही।
रनवीर और बाकी घरबारी सुचित्रा नें सुघड़पाल के ब्याह के लयें अच्छी तें अच्छी छोरी देखिबौ सुरू करि दई। ऐसी छोरी जो अपनी सास-ससुर, ननद और सबकौ लिहाज करिबे बारी होय। सबकूँ सुख पहुँचाइबे के काम करै। पढ़ी-लिखी हू होय जो अपने छोरा-छोरीनु कूँ ठीक तें पढ़ाय सकै। आजकल्ल की पढ़ाई जानें कैसी है गई है कै बालकनु के बजन तें ज्यादा किताबनु कौ बजन है। पहलै के जमाने में छोटे ‘अ’ और गिनती पहाडे़नु की पतरी सी एक किताब हैबौ करै ही, बाही तें खूब हुसियार है जाऔ करै हे, परि अब देखौ एक-एक बालक की पीठि पैं 10-10 किलो कौ बस्ता लटकौ मिलैगौ।
सुघड़पाल की नौकरी सूरत में लगि गई है जा बात की रनवीर कूँ जित्ती खुसी भई उत्तौ ही रंज हू। रंज जा बात कौ कैं घर तें इत्ती दूर जानें कैसें रहैगों सुघड़पाल। बाके खाइबे-पीबे कौ कौन ध्यानु रखैगौ और फिरि घर ते इत्ती दूरि जाइबे पै छोरा कूँ सही मारग कौन दिखाबैगौ। कहूँ इत्ती दूर जाइकें छोरा बिगरि गयौ तौ? जा बात की सोचत ही रनवीर कूँ पसीना छूटिबे लगौ। सुघड़पालनें बिनकूँ तसल्ली दई कै बापू, आप बिरकुलई चिन्ता मति करौ, आजु नाँय तौ कल्लि, नौकरी करनी है तौ बाहर तौ जानौ ही परैगौ। अबई नौकरी मिलि रही है तौ जान देउ, उलाइत ही मैं नजदीक आइबे की कोसिस करुंगौ।
रनवीर और सुचित्रा नें दिल पैं पत्थर धरिकें सुघड़पाल कूँ बिदा करि दयौ।
सूरत पौंहचि कें कछू दिना तक तौ सुघड़पाल नें अपनी राजी-खुसी की चिट्ठी-पत्री डारीं, पर धीरंे-धीरंे चिट्ठी पत्रीनु की संख्या कम है बे लगी। रनवीर-सुचित्रा नें चिंता करी तौ सुघड़पाल नें कही कें काम भौतु रहै है याही तें चिट्ठी पत्री लिखिबे कौ समै नाँय मिलि पाबै।
छह महीना बीतत-बीतत तौ सुघड़पाल की चिट्ठी पत्री और फून तक आइबौ बन्द है गयौ तौ सुघड़पाल के हिय में धुकुर-पुकुर हैबे लगी। कहूँ काऊ चक्कर में तौ नाँय परि गयौ सुघड़पाल। सोचिकें रनवीर टिकट लैंके सूरत जाइबे बारी रेलगाड़ी में बैठि गयौ।
बापू कूँ आयौ देखिकें सुघड़पाल सकपकाय गयौ फिरि अपने कूँ सम्भालत भये बापू तें अचानचक आइबे को कारन पूछौ। कहूँ कछू गड़बड़ी तौ नाँय है। कोऊ हारी बीमारी या कछु और....।
रनवीर नें सुघड़पाल कूँ ऊपर तें नीचे तक निहारौ और फिर खुपिया नजर तें बाकी रहबे बारी जगै कूँ देखौ। सब कछु ठीक-ठाक देखिकें रनवीर कूँ तसल्ली भई।
‘‘बापू आज अचान्चक ही ह्याँ आइबौ कैंसे भयौ, का कोऊ जरूरी काम आय गयौ हो?’’ सुघड़पाल नें पूछी तौ रनवीर नें बहानौ बनाय दियौ-
‘जरूरी कहा, भौतु दिननु तें तेरी कोऊ राजी-खुसी नाँय मिली हती। उतै तेरे ब्याह के लें छोरी बारे चक्कर लगाय रहे हैं सो मैंने सोची कें तोतें मिलनौ हू है जाबैगों और तेरे ब्याह के बारे में हू कछू बात है जाबैगीं। देखि मैं कछू छोरीनु के फोटू लैं कें आयौ हूँ। इनमें तोकूँ कोऊ पसन्द आय रहौ होय तौ बताय दै। 
‘‘बापू, मेरे ब्याह की अबई इत्ती कहा जल्दी है। है जाबैगौ जब समै आबैगौ।’’
‘सो तौ तू ठीक कहि रहौ है, परि अब तू पढ़ि-लिखिकें अपने पामनु पै खड़ौ है। अब तेरौ ब्याह है जाबै तौ मैं हू जिम्मेदारी तें मुक्ति पाय जाऊं।’’
पहलै तौ सुघड़पाल नें खूब ही टालमटोल करी परि रनवीर नें बाकी एक हू नाँय सुनी तौ सुघड़पाल नें रनवीर के पाम पकरि लये-
‘‘बापू, मोकूँ माफ करि देउ, मैंने हियाँ एक छोरी देखि रखी है, बा ही तें ब्याहु करुँगौ।’’
सुघड़पाल की बात सुनिकें, रनवीर कूँ तौ काटौ तौ खून नाँय, जैसी हालत है गई। बानें सुघड़पाल कूँ भौतेरौ समझायौ कें देखि-मइया-बापु तेरे दुसमन तौ हैं नाँय, अच्छी तें अच्छी छोरी तें ही तेरौ ब्याह कराबिंगे। अच्छोै कुल, खानपान और संस्कारबारी, मलूक सी छोरी तें। फिरि तू एैसौ चैं करि रहौ है?
परि सुघड़पाल अपनी जिद्द पै ही अड़ौ रहौ तौ रनवीर नें बाकूँ, अपनी रजामन्दी दै दई।
सुघड़पाल के ब्याहु करि लैबे के बाद कैऊ बरस तक रनवीर और सुचित्रा गुमसुम से रहे। परि बु अपने गुस्सा कूँ ज्यादा दिननु तक नाँय रोकि सके और बिननें सुघड़पाल-उर्मि कूँ बुलाय भेजौ। उर्मि कूँ देखिबे कौ दोऊ जनेनु कौ भौतु मनु हो। बु सोचि रहे हे कै है तौ अपनौ ही छोरा, देखभाल कें ही चुनी होयगी अपनी घरबारी।
परि सुघड़पाल की घरबारी उर्मि ने आयकें अपनौ जो चरित्तर दिखायौ तौ रनवीर और सुचित्रा तौ सकते में आय गये। न काहू तें रामा-किसना, न लिहाज। पूरे दिना कमरा में बन्द रहिबौ, देर रात तक टीवी धूम धड़ाकौ देखिबौ और सुबह कूँ नौ-साढ़े नौ बजे तक बिस्तर पै सोइबौ। जागि कें अपने सास ससुर के पामन कूँ न छूइबौ और न काऊ औरु कौ आदर-सत्कार।
कैऊ दिनां तक तौ सुचित्रा नें उर्मि के जे कुलच्छन देखे परि जब सहे नाँय गये तौ बिननें प्यार तें समझाइबे की कोसिस करी-
‘‘मेरी धीय, छोरा की घरबारी हू अपनी धीय समान ही होबै है या ही तें तोकूँ समझाय रही हूँ। देखि भोर में सूरज के निकरिबे तें पहलें ही जागिबे तें मानुष कौ स्वास्थ्य ठीक रहै है। देर तक सोइबे बारेनु के घर में दरिद्रता कौ बास होबै है। भोर में जागि कें बड़ेनु कूँ रामा-किसना करिबे तें आयु, बिद्या, जस और बल बढ़ौ करै है। अब जि घरू हू तिहारौ ही है।’’
ऐसी ही भौतु सारी सीख रनवीर और सुचित्रा नें दईं पर उर्मि के कान में जूं तक नाँय रेंगी। बानें, बिनकूँ ही उल्टी सीख दें डारीं कें जि बातें अब पुरानी है गई हैं। मो पै नाँय जागौ जायगौ इत्तौ जल्दी, मेरी तौ देर तक ही सोइबे की आदत है। इत्तौ ही नाँय, घर के काहू काम में तनिक हू हाथ हू नाँय  बंटायौ बानें।
सात दिननु में ही सुघड़पाल की घरबारी नें घर में महाभारत मचाय दियौ तो रनवीर नें तोबा करि लई कैं अब जा कूँ कबऊ नाँय बुलाबैगौ बु। जै तौ सुघड़पाल के संगई ठीक है।
इन सारी बातनु कूँ सोचि-सोचि कै ही रनवीर कौ जी हलकान है रहौ हो और बु मन ही मन ऊपर बारे कौ सुमिरन करि रहौ हो कि हे प्रभो मेरी लाज राखियो। जि सन्तान मानुष कूँ जो दिन न दिखाबै, बू ही ठीक है।
एक दिना रनवीर बेकल सौ घूमि ही रहौ हो कें दरबज्जे पै आयकें एक गाड़ी रुकी। सुघड़पाल की घरबारी नें अपनी गोद के छोरा कूँ अपनी सासुल की गोद में दयौ और फिर घूंघट कूँ ठीक करिकें अपनी सासुल और ससुर के पैर छूइबे लगी।
सुघड़पाल की घरबारी के बदले भये रूप कूँ देखिकें रनवीर और सुचित्रा के हिय में सुख की लहर सी दौड़ि गई।

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होरी  कौ बैर

फागुन मास की पूरनमासी। रात कौ समै। चन्द्रमा अपनी धवल चाँदनी बिखेर रहे हे। ऐसे में गाम के लोग-लुगाई, छोरा-छोरी और बूढ़े-ज्वान सब कोऊ उमंग में भरे भये उतकूँ चले जाय रहे हे, जितकूँ थोरी सी देर पाछैं होलिका दहन हौनौ हौ।
थारी में रोरी, चामर, गुँझिया आदि धरिकैं सजी-धजी नारीन नैं होलिका कौं पूजौ और पुरोहित नैं होरी में आग लगाय दई। आग की ऊँची-ऊँची लपटनु में सब अपने-अपने हाथन में पकरे भये बाँस और लम्बी लकड़ियान में बँधी जौ की बालिन कूँ भूनिबे लगे।
ता पाछैं आग कौ एक टुकड़ा अपनी थारी में धरौ और अपने-अपने घरन के आँगन में धरी भई गोबर की गूलरीन तें बनाई भई होरी में आग दहकाई और भुने भये जौ लैकैं घर-घर मिलिबे कूँ चलि परे।
कैऊ बरस है गये, नेतराम के तौ आँगन की जगारी बाके हिये में होरी जरौ करै है। बा दिना नेतराम बाबरो सौ है उठै। धौंताए तैं ही बु अपने आप कूँ अपने काबू में नाँय करि पाबै और बाके हिय कौ बबण्डर तूफान की तरियाँ सब कछू तहस-नहस करिबे कूँ हुंकार उठै है।
होरी कौ दिन नेतराम की जिन्दगी में ऐसौ मनहूस दिन बनिकैं आयौ हौ कै बु नासूर बनिकंे छिन-छिन बा की जिन्दगी में रिसौ करै है।
गाम परधानी कौ चुनाब जोरन पै हो। नेतराम के बापू सेतराम हू चुनाब लड़ि रहे हे। सेतराम की गाम भर में एक भले मानुस के रूप में छवि ही, पै सेतराम के संगई औरु द्वै जने हू परधान के चुनाब में ठाड़े भये हते-टेकचन्द और बालू। बालू की छवि पूरे गाम भर में जुआरी और नसेड़ी के रूप में फैली भई ही। फिरिऊ बु अपनी धींगामस्ती तै चुनाब लड़ि रहौ हो। 
टेकचन्द साहूकारी करै हो सो अपनी रईसी के दाब में गाम बारेन कूँ अपने चुनाब चिन्ह पै मुहर लगाइबे की धौंस सी दै रह्यौ हौ। सेतराम तौ ठहरौ सेतराम, बस जहाँ कहूँ चुनाब कौ प्रचार-प्रसार करिबे की बात आबैई बु बस्स इत्तौ ही कहतौ-‘देखौ जी, जितानौ होय तौ ऐसे कूँ जितैयौं जो गाम कौ कछु भलौ करै। गली-कूंचान में खिरंजा बनबाबै, सड़क पक्की करबाबै और गामन में बिजरी-पानी कौ हू कछू इन्तजाम करबाबै।
गलत मानुस कूँ चुनि लियौ तौ सिगरौ सरकारी पैसा पीबे-पिबाइबे में ही उड़ाय देगौ। गाम की तरक्की कछू नाँय होबैगी।
सेतराम की बात लोग-लुगाइन की समझ मंें आइबे लगी तौ सबनैं मिलि जुलि कै पक्कौ मन बनाय लियौ कै जिताबिंगे तौ अबकी बार सेतराम कूँ ही। बालू कूँ जितायौ तौ सिगरौ सरकारी पैसा खाइबे-पीबे में ही उड़ाय देगौ और टेकचन्द कूँ जितायौ तौ सिगरौ पैसा साहूकारी में लगाइकैं अपनी सात पीढ़िन कूँ तार देगौ। गाम-मुहल्ला जाय भाड़ में। पैसा बारौ बनिकें बु लोगन कूँ और ज्यादा सताबैगौ।
लोगनु की जा बात की भनक टेकचन्द और बालू कूँ हू लगि गई कैं सेतराम नैं सबकूँ समझाय-बुझाय कै लोगन कूँ अपने पाले में करि लियौ है। बस्स फिरि तौ, टेकचन्द और बालू नैं आपस में खुसुर-पुसुर करी और षडयन्त्र रचि डारौ। 
होरी कौ त्यौहार। बालू और टेकचन्द नैं घर-घर जाइकैं सबनु के पाँय पकरे और चुनाब में जिताइबे की गुहार करी। परि लोग-लुगाइनु नें तौ रंगे सियारन कौ मुखौटा पहलें पहचानि लियौ हौ सो दौनौन कूँ धता बताय दई। अब तौ दोऊ औरहु ज्यादा बिलबिलाय उठे और चोट खाये नाग जैसें फंुकारि उठे। सबकूँ साम, दाम, दण्ड, भेद जनाइकैं जा तरियाँ ते बे अपने संग करि सकै हे बाही तरियाँ तै पूरौ प्रयास करिबे लगे।
चुनाब कौ दिन नजदीक आय गयौ। भोर तैं ही बालू और टेकचंद नैं अपने-अपने मुखबिर लगाइ दिये। दोऊ अपने-अपने मन में लड्डू फोड़ रहे हतेे कै अब तौ जीत बिनकी ही होयगी। सेतराम की तौ जमानत हू जब्त है जाबैगी। पै जे का भयौ बोटन की गिनती भई तौ बालू और टेकचंद दोऊ भौंचक से देखत रह गये। जि का भयौ। दौऊनु की जमानत जब्त है गई। ऐसौ कैसंे है गयौ। सेतराम कैऊ हजार बोटनु तै जीति गयौ। टेकचंद और बालू के म्हौडे़ पै कालिख सी पुति गई। जरूर ही सेतराम नै कछू चालाकी करी होयगी। दोऊ बौखलाय उठे और मौके की फिराक में घूमते रहे। ऊपर तौ चुप्प लगाय बैठे रहे।
गाम में बिजुरी के खम्बा खड़े है बे लगि गये। गलिनु कूँ पक्कौ करिबे ताँईं ईंट और गिट्टी परिबे लगीं। थोरे से ही दिनु में गाम में चहुँ ओर कछू न कछू भलौ हैबे लगौ तौ गाम बारे सेतराम कौ गुनगान करिबे लगे। 
सेतराम कौ गुनगान, बालू और टेकचंद कूँ जरे पै नौन छिड़किबे जैसौ लगौ। बु मौके की तलास में रहिबे लगे। बे ऊपर सौं ऐसौ ब्यौहार करिबे लगे कैं इनतै बढ़िया कोऊ दूसरौ नाँय है सकै। सेतराम की बैठक पै हू परधान जी-परधानजी करिकै खूब उठिबौ-बैठिबौ सुरू करि दियौ।
घूमि फिरिकै एक बरस बीति गयौ और होरी कौ त्यौहार आय गयौ। आइबे बारेन सौं सेतराम अपनी बैठक में ही होरी मिलन करि रहे हे। बालू और टेकचंद हू आय गये। दोऊ दारू पी कैं धुत्त हे। होरी मिलन के बाद दोऊ बात-बात में ही सेतराम सौं उरझि परे। गारी दैबे लगे तौ सेतराम नैं डाँटि दियौ। बस्स बालू नैं आब देखी न ताब सेतराम के मूंड पै ईंट उठाय कें दै मारी।
सेतराम के मूंड तै खून कौ फब्बारों सौ फूटि परौ। तुरत ही अस्पताल कूँ लैकें भागे पै रस्ता में ही सेतराम नैं दम तोड़ दियौ। गाम भर में हा-हाकार मचि गयौ। होरी के बहाने बालू और टेकचंद नैं नेतराम के बापू कूँ मारि कैं अपने मन कौ गुबार निकासि लियौ हौ।
नेतराम नैं तौ कबऊ सपने में ऊ नाँय सोची हती कै बापू के संग ऐसौ घटित है जाबैगौ। नेकी कौ बदलौ बदी, नेतराम के हिये में लाबा सौ फूटि परौ। बदले कौ भाव, नेतराम कूँ चैंन तैं नाँय जीबे दै रह्यौ हौ। बानें मन में सोची कै अब की होरी पै बु होरी के बहाने टेकचंद और बालू सौं बदलौ जरूर ही लेगौ। मारि देगौ एकाध कूँ। नेतराम कौ गुस्सा भीतर ही भीतर आग कौ गोला बन रहौ हौ। 
होरी आई तौ नेतराम नैं ऊपर सौं अपने गुस्सा कूँ दबाय कैं राखौ पै मन ही मन कुटिल काम कूँ अंजाम दैबे कौ पक्कौ मन बनाय लियौ। 
होरी मिलिबे बारे हाथन में भुने भये जौ थमायकें और गले मिलिकैं चले जामें। नेतराम कौ तौ तबई तैं बालू और टेकचंद के ह्याँ आइबौ-जाइबौ बन्द हो परि अबकै नेतराम, बालू और टेकचंद के ह्याँ आइबे कूँ ठाड़ौ ही भयौ हौ कै द्वार पै बालू और टेकचंद के दोऊ छोरा रूपराम और धनीराम आय पौंचे। नेतराम देखतौ ही रह गयौ। बु तौ होरी मिलिबे के बहाने इन दोउन में सौं काऊ एक कूँ मारिबे की सोचिके घर तें निकरिबे बारौ हो। बासौं पहलें जे दोऊ आय गये। जरूर ही दोऊ मिलिकें नेतराम कूँ मारिबे आये हुँगे।
‘‘कोऊ बात नाँय, जे दोऊ बापै बार करैं बातैं पहलें बु इन पै बार करि देगौ- ‘‘नेतराम सोचि ही रहौ होै कैं रूपराम और धनीराम दोऊ नेतराम के पाँयन में परि गये- ‘‘दाऊ राम-राम। होरी की मुबारक।’’ 
नेतराम के म्हौडे पै पसीना झलकिबे लगौ। बाने मन ही मन सोची कै अब जे जरूर ही दोऊ मिलिकैं मोपै बार करिंगे। नेतराम घबराय उठौ।
रूपराम और धनीराम दोऊन नैं नेतराम के पाँय पकरि लये- ‘दाऊ, जा दिना सेतराम चाचा के संग बु घटना घटी हती तबई तैं हम दोऊ अपने-अपने बापन की करतूतन पै सरमिंदा हैं परि आपसौं माफी मांगिबे की हू हम हिम्मत नाँय जुटा पाय रहे हे। आजु होरी के बहाने हिम्मत करिकैं आप के ढिंग आये हैं। हमें माफ करि देउ। आप हमें माफ करि देउगे तबई हम आप के पाँयन छोड़िंगे।’
‘का सच्ची कह रहे हो या जामेंऊ अपने बापन की तरियाँ तुम दोऊन के मन में खोट छुपौ भयौ है?’’ - नेतराम अचरज तैं बोलौ।
‘नाँय दाऊ, कोऊ चालाकी नाँय। हम साँची कह रहे हैं। बापू के बनाये बैर-भाबन कूँ हम चैं पीढ़ी-दर-पीढ़ी ढोबैं? हम तौ तिहारे प्यार की छत्र छाया में अपनौ जीवन सफल बनायबौ चाहैं हैं।’
नेतराम कूँ बिनकी बातनु में सच्चाई की झलक दीस परी तौ बु फुक्का मारिकैं रोय परौ और रूपराम-धनीराम कूँ बानैं अपनी छाती तैं लगाय लियौ। मन ही मन बानैं अपने आपु कूँ धिक्कारौ। ऐसे भले छोरान के बारे में बाके मन में ऐसौ बुरौ विचार काहे कूँ आयौ हो। होरी तौ सचमुच ही मेल-मिलाप कौ त्यौहार है जाकूँ अपने मन कौ मैल निकारिबे कौ जरियौ नाँय बनानौ चहियै।


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छुटकारौ

लीलाधर की छोरी रंजना कूँ सामनें तें हँसी-ठठ्ठा करत भये आवत देखि कें मोकूँ चार-पाँच बरस पहलें की बात कौ सुमिरन ह्वै उठौ। रंजना कौ व्याह है बे बारौ हो और छोरा बारेनु नें लीलाधर कूँ धरम संकट में डारि दयौ हो। एक-एक करिकें बूँई सारी बातें मेरे सामनें सिनेमा की रील सी घूमिबे लगीं।
लीलाधर की बात सुनिकें मैं हू सोच में परि गयौ हो। गाम मौहल्ला के नाते मैंने लीलाधर तें पूछी-‘‘तो फिरि कहा उपाय सोचै तुमनें    लीलाधर।’’
उपाय कहा, कछु समझ में नाँय आय रहौ भैया। ब्याह कौ समै एकदम तै सिर के ऊपर आय गयौ तब बिननें ऐसी बात करी है। जा बात कू बु पहलेंई बताय देते तौ भैया सांची कहंू मैं बा घर में अपनी छोरी कौ ब्याह हरगिज नाँय करतौ। अब तुम ही बताऔ मदन भैया, कहू ऐसौ करनौ चहिए छोरी के बाप के संग।
जब छोरा देखिबे कूं गये हे तौ सिगरे घरबारेनु नें बड़ी मीठी-मीठी बात करी हींे-‘‘हमें कछू नाँय चहिए, ऊपर बारें कौ दियौ भयौ सब कछु है हमारे पास। तुम तौ बस जल्दी तें ब्याह कौ मुहूरत निकरबायकें हमकूँ बताय देउ, बस्स बरात लैकें आय जांगे तिहारे द्वारे पै’’ और न जाने कहा-कहा ऐसी ही मिश्री घुरी बातें छोरा के मैया-बाप नंे कही हतीं, पर अब ज्यों ज्यों ब्याह कौ समै नजदीक आबत जाय रहौ है बिनके रोज नए संदेसे आय रहे हैं-‘‘छोरा कूँ जे चीज चहिए, छोरा कूँ बु चीज चहिए।’’अपनी हैसियत के मुताबिक तौ मैं खुद ही अच्छौ ब्याह करतौ मदन भैया, पर छोरा के मइया-बाप के इन संदेसनु नंे तौ अब मेरौ खाइबो पीबो तलक हराम करि दियौ है।
‘‘सो तौ तुम ठीक कह रहे हौ लीलाधर, छोरी के बाप कूँ तौ अपनी इज्जत बचाइबें के लै छोरा बारेनु की जायज और नाजायज सिगरी मांगन कूँ माननौ ही परै है भैया, नाँय तौ छिन भरे में रुँठि के बरात वापस लै जाइबे की धमकी दे डारैं हैं आज-कल्लि। ऊपर तें एक बार छोरी कूँ दाग लगि जाबें है तौ फिर दूसरी ठौर हूँ ब्याह करिबों भौतु मुस्किल है जाबें है।’’
‘जेईं बात सोचि-सोचि कंे जी हलकान है रहयौ है मदन भैया। अब उमरि भरि छोरी कूँ बिनब्याही तौ नाँय बैठारौ जाय सकै है।’
‘‘लीलाधर, कबऊ तुमनंे एक बात पै बिचार करो है का?’’
‘‘कौन सी बात मदन भैया?’’
‘‘जेई कें दहेज रुपी दानब कौ जे रूप दिनौ-दिन बिकराल चांै होतु जाय रहौ है।’’
‘‘दहेज कौ रूप विकराल का मदन भैया, आजु मानुस में धन लिप्सा भैातु बढ़ि गई है, याही तै बु जल्दी तें जल्दी मालदार है जानौ चाहै है। धन चाहे नीति तै हासिल होय औरु चाहे अनीति त,ैं बस्स हासिल होनौ चाहिए।अब दहेज मांगिबे के समै कोऊ जे नाँय सौचे कै सामने बारौ इत्तौ रूपैया कहां तें लाबैगौ?’’
‘‘हाँ जे तौ है ही परि एक बात औरु हू है लीलाधर।’’
‘‘बु कहा, मदन भैया?’’
‘‘बु जे है कै आज जाके पास भौतु सारौ रूपैया है, बुं अपनी छोरी के ब्याह में इत्तौ खरचनौ चाहै, इत्तौ दैनों चाहै कें दुनिया देखि के कहे कै फलाने की छोरी कौ इत्तौ बढ़िया ब्याह भयौ हो कें काऊ कौ आजु तलक नाँय भयौ होइगो औरु न आगे काहूँ कौ होयगौ। बस्स याही होड़ और दिखाइबे की बराबरी करिबे में गरीब कौ कचूमर निकरि जाबै है। दैबे कंू इत्तौ नाँय है परि होड़ के चक्कर में बाहर तें करजौ लैकंे छोरीनु कौ ब्याह रचाबै हैं और फिरि पूरी ऊमरि सिर तै करजा कौ बोझा ऊतारिबे में ही कमरि टेड़ी है जाबै है। लीलाधर! दहेज मांगिबे बारेनु कौ हौसला हू याही तें दिनौ-दिन बढ़ि रहौ है। बिनकूँ का, अपनौ और अपने घरबारेनु कौ पेटु काटिकें करजौ चुकाबें, बिनकूं तौ दहेज चाहिए बस्स। इत्ती सी हू मानवता नाँय बची है कंे छोरी बारे हूं, ब्याह के बाद तौ अपने ही सगे भये। बु जिन्दगीभर दुख भोगिबौ करै और छौरा बारे देखिबौ करै।’’
‘‘जेई तौ मदन भैया। अब तुमईं बताऔ कोऊ उपाय, अब तौ पानी सिर तै ऊपर जाय रहौ है। अब ऐन बखत पें मैं कहाँ तै इन्तजाम करूँ इत्तै रूपैयानु कौ। छोरा के बाप नें संदेसौ भेजौ है कें एक लाख रूपैया नकद हू चाहिए, नाही तौ हमारी हैसियत सब मिट्टी में मिलि जावैगी।अब तुम ही बताऔ मदन भैया, इतैं मेरी इज्जत कौ जो जनाजौ निकरि जाबैगौ, बाकी कोऊ परबाह नाँय है छोरा बारेनु कूँ। अब खेती-बारी में तौ छटे-छमाहे ही पैदावार होय है, वाही तै घर गिरस्ती चलानी परै। अब एकदम तै एक लाख रूपैया का, आसमान तें टपकिंगे?’’
‘‘करनौ चाहौ तौ एक उपाय है लीलाधर।’’
‘बताऔ मदन भैया, बेगि बताआ,ै मरतौ का न करतौ। है सकै तिहारे उपाय तें मेरी मुसीबत दूरि है जाबै।’’
‘‘बिरकुलि है जाबेगी लीलाधर। जि बात तौ तुम्हें माननी ही परैगी कै काऊ बात कूं बरजौ नाँय जाय तौ बु बढ़ैगी ही।’’
‘बिरकुल ठीक कह रहे हौ मदन भैया।’ 
‘‘तौ सुनौ, छोरा कहा करै है जाको ब्याह करिबे जाय रहे हौ।’’
‘‘छौरा तो कछु नाँय करै बस्स भागवत-कथा बाँचिबौ करै है।’’
‘‘तौ ऐसौ करौ, ब्याह तैं एक दिना पहलें पास के थाने में जायकें रपट लिखाय अइयौ कें छोरा बारेनु नें दहेज की मांग करी हतै, यातें ब्याह में बाधा परि सकै है। बस्स फिरि देखौ तमासौ।’’
‘‘अरे जे कहा कह रहे हौ मदन भैया, ऐसै तौ मेरी ही इज्जत कौ तमासौ बनि जाबैगौ। फिरि तौ मेरी छोरी बिरकुलिही बिनब्याही रह जाबैगी।’’
‘सो तुम बिरकुलई चिन्ता मति करौ लीलाधर। तिहारी छोरी कौ ब्याह होइगौ और बाही मुहूरत में होइगौ और बा छोरा तें अच्छे छोरा के संग होइगौ। परि इन ससुरेनु कूँ पुलिस के डंडानु तें पिटवायकें भगायबौ भौतु जरूरी है। 4-6 बरातनु मैं ऐसौ है जाय तौ ससुरे सब भूलि जांगे दहेज मांगिबौ।’
‘‘परि मदन भैया, मैं तौ तिहारी बात सुनिकें अबई तें डरि गयौ हूं कहू मेरी छोरी कौ.....’’
ठीक है, चलौ मैं तिहारी बात कूं बड़ी करूँ, तुम अबई एक लाख रूपैया कौ करजा करिकंे, ब्याह दैऊ अपनी छोरी कूं। फिर चुकावत रहियौ करजा और फिर या बात की हू कहा गारन्टी है कै साल-छह महीना बाद छोरा बारेनु की ओर तै औरु कोऊ मांग नाँय आबैगी। एक साल बाद छोछिक के समै बिननें द्वै लाख रूपैया की मांग करी तौ कहाँ तै देऊगे और फिर बाके हू एक साल बाद फिरि उनकी मांग आई तौ बु छोरी कूँ गैस तें जरि गई बताय के मारि डारें तौ कहा करौगे?
‘‘बस्स-बस्स मदन भैया। अब आगे कछु मति कहियौ।’’
मैं कछु कहँू या नाँय कहूँ, परि दहेज लोभिनु कौ तौ जेई रूप है लीलाधर। एक बेर खून म्हौड़े तै लगि जाय तौ सहज नाँय छूटै। जेई हकीकत है लीलाधर,, तुम मानौ चाँय मति मानौ। यातें इनकूं सबक सिखाइबौ भौतु जरूरी है। थोड़ी सी हिम्मत तें काम लेऊ, सब भली करिगे राम और फिर लीलाधर नें वैसौ ही करौ जैसौ मैंनंे बतायौ हतौ।
आजु लीलाधर की छोरी रंजना खूब ही सुख में है। रानी की तरियां मौज करि रही है अपनी सासुरे में। लीलाधर कूँ ना तौ कोऊ करजौ करनौ परौ और न करजौ उतारिबे की चिंता। लीलाधर सरीखे 10-20 और हिम्मत करैं तौ दहेज रूपी जौंक तें छुटकारौ मिलिबे में देर नाँय लगेगी।’’’

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फूलो 

फूलो के छोरा कौ ब्याह है कें आयौ तौ फूलो मन ही मन फूली नाँय समाय रही ही। घर-गिरस्ती की सारी जिम्मेदारिनु कूँ छोरा की घरबारी कूँ सौपि कें अब बुं घर में बैठि कें राज करैगी।
जा बात कूँ बुँ जाने कित्ते लोग-लुगाइनु कूँ सुनाय चुकी ही।
कछू तौ फूलो की बातनु कूँ सुनिकें हाँ में हाँ मिलायबौ करै हे तौ कछू फूलो के मन में अपनी बातनु तें डरु हू पैदा करि दैबे हे। बुं फूलो कूँ आजु-कल्लि की बहूनु के ब्यौहार तें आगाह करिबौ नाँय भूलै हे।-
‘‘अरी फूलो, अबई तें इत्ती खुसी मति मनाय कें छोरा की घरबारी आयबे तें पहलें ही सिगरी खुसीन कूँ लुटाय बैठें। आजु-कल्लि की बहूनु कौ कोऊ भरोसौ नाँय हतै, पतौ चलै कें तेरी सेवा टहल करिबौ तो दूरि की बात तेरे छोरा कूं ही तो तें छीनि लेय।’’
लोग-लुगाइन की बातनु कूं सुनि-सुनि कें कबऊ तौ फूलो कौ दिल जोर तें धुकरि-पुकरि करिबे लगै हो तौ कबऊ अपने आपु में तसल्ली दैबौ करे हो। चलौ जो होयगौ सो देखौ जायगौ।
परि फूलो अपने मन कूँ जित्ती तसल्ली दैबे की कोसिस करै ही उत्तौ ही बा कौ मन बेकल है रहौ हो। ऐसौ चांै होयगो बा के संग? बानें तौ काहू के संग कछू बुरौ करौ नाँय है फिरि बा के संग बुरौ चांै होयगौ? अच्छी ही निकरेंगी बा के छोरा की घरबारी तौ। कित्ती तपस्या के बाद तौ जि छोरा पायौ हो बानें। 
बाके ब्याह भये कैऊ बरस बीति गये हते परि बाकी कोखि हरी नाँय भई हती। कछू बरस तौ यौ ही बीति गये। परि फिरि धीरें-धीरें मौहल्ला-पड़ौस में खुसुर-पुकुर हैबे लगी-‘‘अरे जे तौ बांझ है, इत्ते बरस तक हू कछू पैदा नाँय भयो तौ अब का होयगौ?’’
सुनिकें बुं तकिया में म्हौड़ौ घुसाय कें खूब ही रोई हती । बाके दरद कूं समझि कें बाकी सासुल नें बाकू तसल्ली दई हती,-‘‘ अरी फूलो मन छोटौ मति करि री, देखि ऊपर बारे के बिधान कूं कोऊ नाँय जान सकै है, बा की मरजी होयगी तो तेरी कोखि अबऊ हरी है सकै है देखि मैं कल्लि ही पंडित जी कूं बुलाय कें फिरि तें पंचांग दिखबाऊंगी। अब तू रोयबौ बंद करि दै।
अपनी सासुल की ऐसी प्यार भरी बातें सुनिकें बानें अपने आँसू पौछि लये और दोऊ नैननु कूं मूदि कें बंसीबारे कौ ध्यानु करिबे लगी जानें बा कूं इत्ती अच्छी सासुल दई है।
ब्याह है कें जब फूलो अपनी सासुल के आई हती तौ बूं निरी ही मूरख हती, मैया-बापू कौ साथ तौ बचपन में ही छूटि गयौ हतो सो बिन मैया-बापू के जैसी परबरिस हैे सकै है वैसी ही परबरिस फूलो की भई हती। काऊ बात कौ कोऊ ज्ञान ही नाँय हो। ना तौ सास-ननद कौ लिहाज करिबे कौ सऊर और ना जेठ-जिठानी कौ ही। घर के काम काजनु कौ हू कोऊ खास अनुभव फूलो कूं नाँय हो। सासुल की बातनु कूं सुनिकें हू बूं अनसुनी सी करि दैबौ करै ही।
कबऊ-कबऊ तौ बूं सासुल की बातनु कूं सुनिकें चुप्प लगाय जाऔ करैही, न भोर भये जल्दी जागि कें घर-गिरस्ती के कामनु कूं करिबे की चिन्ता और न संझा कूं ही।
ऐसे में फूलो की सासुल बा कूं धीरें तें समझाऔं करैं ही-
‘‘अरे फूलो,मेरी धीय, देखि अब जि घर तेरौ अपनौ घरु है, जा की संभार, देख-भाल अब सब कछू तोकूं ही करनी है। अब मैं तौ बूढ़ी है चली। हाथ-पामनु में हू इत्ती जानि नाँय रही। पके आम सी जानें कब टपकि परुंगी, या तें तू मेरे रहत भये, घर-गिरस्ती के सबु कामनु कूं सीखि लें।
सासुल की बातें सुनि-सुनि कें फूलो कबऊ तौ रिसियाय जाऔ करै ही तौ कबऊ सुनिकें काम में लगि जाओ करैही।
फूलो की सासुल अच्छी तरै जानें ही कें फूलो के मैया-बापु बचपन में ही गुजरि जाइबे के कारन जाकूं संस्कार दैबे बारौ कोऊ नाँय हो सो बिननें सोची कें फूलो अबई कच्ची माटी सरीखी है। जा तरियाँ कुम्हार अपने चाक पै कच्ची माटी कूं धरिकें बांस तें चाक कूं घुमाय कें और हाथ कौ सहारों दैकें सुन्दर-सुन्दर बरतन-भाड़े बनायबौ करै है वाही तरियाँ तें फूलो कूं हूं, हाथ लगायबे की जरूरत है। जब या की सोच में परिपक्वता आय जाबैगी तौ भले-बुरे कौ ज्ञान हू अपने-आपु ही है जाबैगौ और फिरि आलस कूं छोड़ि कें अपने घर-गिरस्ती कूं अपने आपु सम्भारि लेगी, फूलो।
‘‘सहज पकै सो मीठौ होय’’ की कहाबत फूलो पै सही उतरी और फूलो धीरें-धीरें अपनी सासुल की बातनु पै गहराई तें विचारु करिबे लगी। जानें कब बुं एक कुसल सुग्रहणी में बदलि गई, बा कूं पतो ही नाँय चलौ। अब बूं खूब तौ अपनी सासुल की सेवा करिबे लगी और खूब ही ननद, जिठानी कौ लिहाज करिबे लगी ही। परि  ऊपर बारे की लीला हू विचित्र है। कैऊ बरस बीति गये, परि फूलो की गोद नाँय भरी तौ सासुल नें एक जोतिषी कूं फिरि तें बुलाय कें पंचांग दिखायौ।
जोतिषी की सलाह तें फूलो नें गोबर्धन महाराज की परिकम्मा करी। चलि कें नाँय, दण्डौती देत भये लोटि-लोटि कें। और मनौती मानी कें हे गोबर्धन महाराज, तिहारी लीलानु कूं कौनु जानि सकै है। मो दुखिया कूं तिहारौ ही सहारो है। सन्तान हीन नारी की पीड़ा कूं तिहारे बिना कौनु जान सकें है। तिहारी किरपा तें मेरे छोरा है जाबैगौ तौ फिरि तें एक बार दण्डौती परिकम्मा लगाऊंगी।
और लीलाधारी की लीला तें बाके छोरा कौ जनम भयो हो। फूलो नें बा कौ नामु लीलाधर ही धरौ।
अब बा ही लीलाधर कौ ब्याह है कें आयौ हतो तौ फूलो अपनी खुसी कूं कैसें रोकि पाती? फूलो नें तौ अपनी सासुल के संग जो करौ हो सबु अनजाने में करौ हो। बाके मैया-बापु बचपन में ही छोड़ि कें नाँय गये होते तौ बुं ऐसी अनाड़ी तौ नाँय ही होती। परि लीलाधर की घरबारी तौ पढ़ी-लिखी हुसियार छोरी होयगी। कोऊ फूलो की तरियाँ बिना पढ़ी-लिखी थोड़ीई है। बा के मैया-बापु नें तौ कुम्हार की तरियाँ बाकूँ अच्छी तरह गढ़ौ होयगौ औरु थोरी भौतु कछु कमी रह हू गई होयगी तौ फूलो कौ अपनी जिन्दगी कौ अनुभव का दिना काम आबैगौ?  बु अपने छोरा की घरबारी कूं अपनी धीय सरीखी ही प्यार देगी और फिरिउ कोउ गलती करैगी तौ प्यार तैं बाकूं समझाइबे की कोसिस करैगी। अब जि घरबार है तौ बा ही कौ। देर सबेर अपने आपु सम्भालैगी। आगें बंसीबारे की मरजी।
जा बिचार के आबत ही फूलो के मन की सारी बिकलता भागि गई।

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समाज कौ कोढ़ 

‘‘जब तलक काहू आदमी के संग मिलि बैठिकें कछू समै तक परखों न जाय, बाहरी आचरन कूँ देखिकें, बाके अंदरूनी विचारनु कूँ नाँय जानों जाय सकै है। है सकै जामें कछु झूठ हू होय, परि मेरौ ऐसौई सोचिबौ है।’’-
मेरी ओर कूँ देखत भये काका बोले तौ मैं भीतर ही भीतर चैंकि उठौ - ‘तिहारौ सोचिबौ सोलह हू आना सही है काका। काहू की ऊपरी तड़क-भड़क कूँ देखि कें जि अनुमान लगाइबौ कें जि तौ कैऊ गामनु कौ रहीस होयगौ या जि तौ निरौ कंगला ही होइगौ, निरी मूरखता ही होयगी।’
‘‘हाँ, जेई तौ मैं हू कहि रहौ हूँ रंजन। कबऊ-कबऊ हम जाकूँ बड़ौ मददगार औरु भलौ मानुस समझें हैं बुँ निरौ राक्षस सौ व्यौहार करिबे बारों निकसै है और जाकूँ जे समझें हैं कें जे कहा कामु आबैगों बुँ अपने ब्यौहार तें अचरज में डारि दैबै है।’’
‘हाँ, सोई तौ। परि काका एक बात पूछूँ?, - मैंने काका की ओर कूँ देखौ।
‘‘हाँ-हाँ पूछि, कहा पूछनौ है रंजन?’’
‘मैं जे कहि रहौ हूँ काका कें आजु आपुकूँ कौन की सुधि आय रही है? कौनु सौ ऐसौ मानुस यादि आय गयौ जातें आपु ऐसी बात करिबे लगे हौ। का काहू नें कछु कहि-सुनि दई है? या कोऊ पुरानी बात फिरि तें उभरि आई है?’
मेरी बात सुनिकें काका नें मेरी लंग कूँ देखौ फिरि ऊपर आसमान की ओर कूँ देखत भये बोले- ‘‘भैया रंजन, अब तोकूँ कहा बताऊँ, जा ऊपर बारे की हू अजब ही लीला है। जब चाहें और जाकूं चाहै है राजा बनाय दैबे है औरु जब जाकूँ चाहें तौ रंकु बनाय दैबे है। इत्तौ ही नाँय, जब चाहें तौ सम्माननु कौ मुकुट सिर पै ध्ाराय दैबे  है और जब जाकू चाहें तौ अपमान कौ गरलु पीबे पै मजबूर करि दैबे है भैया।’’
‘हाँ, सो तौ है काका, आपु बिरकुलि ही ठीक कहि रहे हौ, जा ऊपर बारे की लीला के कैऊ अचरज भरे करतब तौ मैंनें हू देखे हतैं, अपने जीवन में।’ 
‘‘अच्छौ! सच्ची कहि रहौ है न, रंजन?’’- अपनी बात कौ समरथन होत देखि, काका नें मेरी लंग कूँ देखौ।
‘हाँ, बिरकुलि ही सच्ची कहि रहौ हूँ काका। एक बेरि नाँय, कैऊ-कैऊ बेरि। परि बुँ सबु मैं फिरि कबऊ सुनाऊँगौ जब आपुकौ जी चैन में होइगौ, अबई तौ मैं बुँ बात जानिबौ चाहूँ हूँ जाके कारन आपुकौ जी अकुलाय रहौ है।’
‘‘हाँ, तू कहि तौ ठीक ही रहौ है रंजन।’’-मेरी ओर कूँ काका नें निहारौ तौ मैं काका के ढिंग कूँ सरकि आयौ औरु आलथी-पालथी मारि कें बैठि गयौ -
‘हाँ तौ सुनाऔ काका, कहा बात है जानें आपकूँ बेचैन करि दयौ है आजु?’
काका नें बात सुरू करिबे तें पहलें इधर-उधर कूँ देखौ और फिरि  धीरें तें फुसफुसाये - ‘‘भैया रंजन तू तौ हमारे घर-परिवार औरु बच्चानु कूँ भली-भाँति जानें है। काहू में कोऊ एबु नजरि आयौ कबऊ तोकूँ?’’
नाँय काका। काकी और भैया मणि की तौ जित्ती तारीफ करी जाय थोरी है। परि आपुनें जे बीच में अपने परिबार की बात कहाँ तें छेड़ि दई,आपु तौ काहू घटना के बारे में बतायबे जाय रहे हते, जानें आपुकौ.
‘‘ठहर रंजन, जरा सौ ठहरि भैया।’’- काका नें मोकूँ बीच में ही टोकि दयौ - ‘‘बुँ ही सबु बतायबे जाय रहौ हूँ भैया, ध्यान तें सुनि। जा ऊपर बारे की अजब लीला की कहानी ही सुनाय रहौ हूँ तोकूँ मैं।’’
काका के कहिबे में एक अजीब से दरद कौ आभास मोकूँ भयौ। जरूर ही कोऊ ऐसी बात है जानें काका कूँ भौतु आहत करि दयौ है। मैं चुप्प चाप काका के म्हौड़े की लंग कूँ निहारिबे लगौ तौ काका नंे अपनी बात सुरू करी-
‘‘देखि रंजन, अपनौ जे मणि है न भैया, जाके बारे में तौ तोकूँ पतौ ही है, जाकौ ब्याहु कैसें भयो हतो?’’
‘हाँ, थोरौ-भौतु तौ पतौ है परि पूरी जानकारी नाँय है, काका।’ मैंनें सकुचात भये काका कूँ निहारौ। ‘परि काका, मणि के ब्याह कूँ तौ द्वै बरस के आस-पास है गये हुंगे अब। अब कहा कछु बात है गई?’ 
हाँ, बुँ ही सब तौ बताय रहौ हूँ भैया। तोकूँ पूरी बात पतौ नाँय होइगी। मणि कौ ब्याहु हमनें, बाही की पसंद की छोरी तें करौ हतो। पढ़ाई पूरी करत-करत मणि औरु मणि की सहपाठिन रजनी नें अपने प्रणय की पढ़ाई हू पूरी करि डारी हती। जि बात जब तेरी काकी कूँ पतौ चली तौ बानें मणि कूँ भौतु खरी-खोटी सुनाई-अरे, इकिलौ ही तौ पूत हतो मेरौ, कोऊ दस-बीस पूत तौ हते नाँय जो एक के में न सही दूसरे के ब्याह में अपनी इच्छानु की पूरती करि लुंगी मैं। अरे ऐसी कहा जल्दी मची ही तोकूँ मणि। का तेरे मइया-बापु तेरौ ब्याहु नाँय करते या बिनकों भरोसौ नाँय रहौ तोकूँ जो तैनें अपने-आपु ही......।
कहत-कहत तेरी काकी कौ गरौ भरि आयौ, परि भैया, मणि औरू रजनी नें तौ जो करनौ हतो सो तौ करि ही डारौ, अब भलाई या ही बात में हती कें कैसेऊ अपने घर की इज्जत ढकी-छुपी रहे। या तें मैंने ही तेरी काकी कूँ समझाय-बुझाय कें राजी करौ औरु मणि-रजनी के प्रेम-ब्याह कूँ संयोजित ब्याह में बदल बायबे की कोसिस करी हती औरु रजनी के मइया-बापु कूँ सारी बात बतायकें, उनतें कही कें देखौ जी, हमारौ तौ छोरा है, कछु नाँय बिगरैगों परि तिहारी है छोरी, पूरे मौहल्ला, समाज औरु रिस्तेदारिनु में हूँ तिहारी बदनामी है जाबेंगी। तिहारे छोटे छोरा-छोरीनु के ब्याहनु में हू जा बात कौ असरु परि सकै है यातें भली बात जे होइगी कें जा ब्याह कूँ प्रेम-ब्याह की जगह संयोजित ब्याह में बदलि देऊ। दिना-तारीख तुम तय करिलेऊ बाही मुहूरत में हम मणि की बारात लैकें आय जाबिंगे तिहारे द्वारे। 
‘जे तौ तिहारी भल मनसाहत ही काका जो छोरी बारेनु की इज्जत कौ ख्याल रखौ।’
‘‘परि भैया रंजन, मेरी भलमनसाहत कौ रजनी के घरबारेनु नें जो उत्तर दयौ वाय सुनौगे तों तुम हू अचरज करौगे।’’
‘अच्छौ! ऐसौ कहा कहि दयौ बिननें काका? नैक मैंऊ तौ सुनँू।’- मेरी जिज्ञासा कूँ देखि कें काका नें बतायबौ सुरू करौ - 
‘‘बिननें कही कें हमारे पास कछू नाँय हतु, छोरा-छोरी कूँ कोरट-कचैरी में जाय कें रचाय लेंन देउ ब्याहु। भैया रंजन, बिनकी बात कूँ सुनिकें मोय तौ काटौ तौ खून नाँय जैसी हालत है गई। जे कहा कहि रहे हैं, इनकूँ तौ अपनी इज्जत कौ ढिंढोरा पीटिबे में तनिक हू लाज नाँय आय रही है। अब कहा करौ जाय। मैं तौ अपनों माथों पकरि कें बैठि गयौ रंजन, बिरकुलिई किंकत्तर््ाव्य विमूढ़ सौ।’’
‘जे तौ बात ही ऐसी हती काका, कें कोऊ भलौ-मानुस चकराय जाबै। फिरि आपुनें कहा करौ काका?’ - काका की बात सुनिकंे मैं हूँ चकराय गयौ। 
‘‘फिरि, फिरि का करतों रंजन। छोरी बारेनु कौ खूब भरौ-पूरौ परिबार, धन-दौलत होत भये हूँ ऐसी बेसरमी की उम्मीद नाँय हती मोकूँ। लौटिकें उलटे पाँय घर कूँ आयौ, पास बुक लैंके बैंक गयौ औरु फिरि पचास हजार रूपैया बैंक तें निकासि कें छोरी के बाप के हाथ पै ध्ारि दये - लेऊ, जिनतें बरातिनु की खातिरदारी करि दैयों।’’
‘एक भलौ मानुस औरु यातें ज्यादा का करि सकै हो काका, आपुनें तौ खूब ही साथ दियौ, छोरी बारेनु कौ।’ 
‘‘परि भैया, बा समै मैनें जे ठीक नाँय करौ हतो, जि बात अब मोकूँ घुन की तरियाँ भीतर ही भीतर खाय रही है।’’
‘‘चैं काका, ठीक चै नाँय करौ हतो? छोरी बारेनु की इज्जत धूरि में मिलिबे तें बचाय लई ही आपुनें तौ।’ - काका की बात सुनि कें मैं अचरज तें उछरि परौ।
हाँ रंजन, ठीक कहि रहौ हूँ भैया। थोरे दिना तक दोऊ घरनु की बदनामी होती औरु कछु दिना बाद सब भूलि जाते। ब्याहु है कें छोरी काहूँ और ठौर चली जाती औरु छोरा कौ कहूँ और ठौर है जातो ब्याह। परि मेरी नादानी नें जनम भरि के लें नासूर पैदा करि दयौ रंजन। 
‘जे का पहेली सी बुझाय रहे हो काका, नैक ठीक तें बताऔ न।’- काका की जि बात सुनिकें मैं तौ भौतु ही उरझन सी में परि गयौ। मैंने आतुरता तें काका की लंग कूँ देखौ जिनमें पीड़ा के सैलाब से उमड़ि रहे हते। मैं घबराय गयौ औरु काका कौं निहोरौ करौ- 
‘काका कछु हरज न होय तौ मोकूँ कछु ठीक तें सारी बात बताऔ।’
‘‘का बताऊँ रंजन, मेरौ सोचिबों हो कें ब्याहु हैबे के बाद छोरा-छोरी प्रसन्न रहिंगे औरु काम-धंधे में लगिंगे, पढ़े-लिखे तौ हैं ही ठीक ठाक। परि भैया, मेरौ सोचिबौ ठीक नाँय हो। ब्याह के बाद छोरी नें एक नयौ ही नाटक सुरु करि दयौ, बुँ पूरे दिना में न तौ अपनी सासुल कौ घर के काहू काम में हाथ बटाबें औरु न खानौं-पीनौ ही बनाबें, बस्स पूरे दिना पड़ी-पड़ी किताबें पढ़ौ करें या फिरि टी.वी. के कार्यक्रमन में आँखि गढ़ायबौ करें औरु संझा कूँ बनि-ठनि कें अपने खसम कूँ संग लैकें अपने मइया-बाप के घर पहुँचि जायौ करै। अब तू ही बता रंजन, का जे बात सोभा दैबंे है?’’
‘जे तौ भौतुई बुरी बात है काका, अपनी सासुल कौ हाथ बटानों जरूरी है काम में। औरु फिरि रोज-रोज कौ मायके जायबौ, जे तौ औरु हू बुरी बात ही।’- मैंने काका की बात कौ समरथन करौ।
हाँ तौ रंजन, याही में मैंनें एक दिना मणि कूँ टोकि दयौ कें भैया, रोज-रोज के ससुरार जाइबे तें इज्जत में बट्टों लगै है। बस्स, मेरौ इत्तौ कहिबों हो कें मणि की घरबारी ने एक कमरा में घुसि के फटाक् तें दरबज्जों बन्द करि लयौ। मैं तौ भौतु घबराय गयौ भैया, जे का भयौ। बा कमरा में ही मिट्टी के तेल की कट्टी हू रखी हती। कहूँ मणि की घरबारी...... मैंनें दौड़ि-दौड़ि कें मुहल्लाभरि के लोग-लुगाई इकट्ठे करि लये औरु कमरा कौ दरबज्जौ जैसें-तैसें करिकें खुलबायौ औरु मणि की घरबारी कँू बाहर निकारौ। बाकूँ ठीक-ठाक पाय कें प्रभू कूँ धन्यवाद दयौ, नाही तौ छिन भरि में का तें का है जातौ। 
मैं जि सोचि ही रहौ हो कें इत्ते में तौ गाड़ी भरि कें मणि के ससुरालिया आय धमके। गाड़ी तें नीचें पाम ध्ात्तई बिननें कही कें लाओं हमारी छोरी की ल्हास कहाँ है जाकूँ तुमनें अबई जरायौ हतो। मैं तो देखि-सुनि के सरम तें धरती में गढ़ि गयौ, परि उनकूँ इत्ते में हूँ तसल्ली नाँय भई। अपनी छोरी कूँ अपने संग ही लै गये औरु ‘दहेज कें लैं ससुराल में प्रताड़ित करिबे की रपट लिखाय दई, औरु बाके बाद जो फजीहत भई मत पूछि भैया। जानें कौनु जनम कौ पाप उदय है गयौ भैया, जु ऐसे बानक बने। भौतु अपमानु सहौ है, रंजन।’’
बताबत-बताबत काका की आँखिन की दोऊ कोर भीगि उठीं। काका की पीड़ा की गहनता कौ अहसास करि कें मैं हूं बिगलित है उठौ‘- ‘काका, भारत की नारी तौ सदा तें पूजनीय रही हंै परि अपने देस में कछु बरसन में दहेज नै कोढ़ कौ रूप धारन करि लियौ है जो दूसरे की छोरीनु पै अत्याचारु करबाय दैबें है या ही तें सरकार नें धारा 498 औरु 498-ए के तहत नारी के सम्मान की रक्षा के लें सख्त नियम बनाये हतें, परि समाज के कछु दुष्टजन उन धारानु कौ दुरूपयोग ज्यादा करि रहे हतें यातें भले मानुसन कौं जीनों दुसबार है गयौ है। परि काका, ऊपर बारे के य्हाँ देर है अन्धेर बिरकुलिऊ नाँय है, सच्चाई तौ सच्चाई ही है, चिन्ता मती करौ, दूध कौ दूध औरु पानी कौ पानी, जरूर होइगौ। छोरी बारेनु कूँ एक दिना अपनी भूल कौ अहसास जरुर होबैगों औरु बुँ, आपु तै जरूर माफी मागिंगे।

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जहाज कौ पंछी 

संन्ध्या बन्दन करिकें मैं ज्यौ ही निकसौ कें सामनें दाऊ बैठे दीखि गये औरु अचानचक ही मेरे डग हुआँ-के-हुंईं थमि गये। मोकूँ लगौ के दाऊ के म्हौंड़े पै औरु दिना के सी चमक नाँय है। बिन कों मलिन सौ म्हौड़ों देखिकेें मोकूं कछु अचरजु सौ भयौ। जरुर ही आजु कोऊ बात होयगी, सोचिकें मैं दाऊ के ढिंग जाय कें खड़ौ है गयौ- 
‘दाऊ पायलागूं।’
‘‘सुखी रहौं।’’ कहि कें दाऊ ने मेरी लँग कूं देखौ- ‘‘औऊ वीरेन, सबु ठीक-ठाक है?’’
‘हाँ दाऊ, आपकी किरपा तें सबु ठीक-ठाक है। परि दाऊ एक बात पूछूँ?’
‘‘हाँ-हाँ, पूछि वीरेन।’’
‘दाऊ, आजु तिहारेे म्हौड़े पै कछु मलिनता सी देखि कें मेरौं मनु जानें कैसौे-कैसौं है उठौ है। कहा बात है दाऊ, आजु कछु चिन्ता-सी में घिरे लगि रहे हों।’
‘‘अरे नाँय वीरेन, एैसी तौ कछू बात नाँय है भैया। तोकूँ बैसेंई लगौ होयगौ।’’ - दाऊ ने खटिया पै खिसकत भये मेरौ हाथु पकरि कें अपने ढिंग बैठाय लियौ, - ‘‘औरु सुना वीरेन, सन्ध्या बन्दनु है गयौ?’’
हाँ दाऊ, सन्ध्या बन्दनु करिकें ही तौ आय रहौ हतो। तिहारौ कुम्हलायौं सौ म्हौड़ों देखि कें रुकि गयौ हतो। परि आपु कहि रहे हों तौ मानि लेतूं, परि मोकू तौ आजु, सबु ठीक-ठाक सौ नाँय लगि रहौ।’
‘‘अब तोकूँ कैसें समझाऊँ मैं, ऐसी कोऊ बात नाँय है, बस्स, आजु छुटकी की याद आय गई हती सो..............
अच्छौ, तौ जि बात है। मैं समझि गयौ दाऊ। सबु समझि गयौ। आपुनें बु कहावत तौ सुनी ही होयगी कें मूल तें ब्याजु जियादा प्यारी लगौ करै है। ठीक है न दाऊ? 
अब, बहू-बेटानुतें तौ गुस्सा है के आपु आय गये य्हाँ, परि आपुके मन बहलायबे कौ जो इकिलौ साधन हो, ‘‘छुटकी’’, बूँ तौ अपने मइया-बापू के ढिंग ही रहि गई। सेवानिवृत्ति के बाद छुटकी की तुतली-तुतली बातनु कौ जु आनन्द आपु उठायौ करौ हों, बाकौ अहसासु अब आपु कूं है रह्यौ है। मैं ठीक कहि रहौ हूँ न दाऊ?’-
कहत भये मैंनें दाऊ के म्हौड़े की लंग कूं निहारौ। मेरौ निसानौं ठीक बैठों हो। मेरी बात सुनिकें दाऊ की आँखिनु की दोऊ कोर भीगि उठीं - 
‘‘तू ठीक कहि रहौ है बीरेन। घरबारी के गुजरि जायबे के बाद, मोकूँ  घरु सूनौ-सूनौ लगौ करैओ। परि जा छुटकी नै अपनी बाल  लीलानुुतें मोकूं मोहि लियौ है। घर में छोटे बालकनु की किलकारी तौ मानुष के नीरस जीवन में हू आनन्द कौ संचार करि दैबें हंै।’’-कहत भये दाऊ की आँखिनु में छुटकी की किलकारी भरे चित्र साकार ह्बै उठे, बिनकी आँखिनु की पुतरियाँ देखिकें ऐसौ ही लगौ। 
‘‘ठुमकि चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ’’ जैसों ही मनोहारी चित्र बा समैं दाऊ की आँखिनु में साकार है रह्यौ हो। 
दाऊ सरकारी महकमा में अच्छे से पद पै नौकरी करै हे। सेवानिवृत्ति तें पहलेंई दाऊ ने अपने छोरा औरु दोऊ छोरीनु के ब्याह करिे दये हते सो दुनियादारी औरु जिम्मेदारीनु की जियादा चिन्ता दाऊ कूं कबऊ नाँय रही। सेवानिवृत्ति के बाद अच्छी पेंसनि हूँ दाऊ कूं मिलिबौ करै ही। परि दाऊ की तकदीर में, उमरि के चैथेपन में घरबारी कौ संगु नाँय लिखौ हो सो सेवानिवृत्ति तें द्वै-तीन बरस पहलेंई घरबारी के गुजरि जायबे तें बिनकूं अजीब-अजीब सौ लगौ करै हो। कुनबा के सारे कामु और मौहल्ला-पड़ौस के लोक-ब्यौहार, सब कछू में चतुर घरबारी के रहत भये दाऊ नंे कबऊ चिंता ही नाँय करी, परि घरबारी के गुजरि जायबे तें, जीवन कौ एकाकीपनु औरु घर की सूनी-सूनी दीबार दाऊ कूँ भीतर ही भीतर आकुल-ब्याकुल करिबों करैं हीं। रहि-रहि कें दाऊ कूँ अपनी घरबारी कों बीच अधर में छोड़िकें चलौ जाइबौं, एक सपनों सौ लगि रहौ है। अच्छी भली मानुष काया, कैसें राख के ढेर में बदलि जाबै है सोचि-सोचि कें बिनके हिय में हूक सी उठौ करै है।
कहौ करें हैं के समै कौ मरहमु अच्छे-अच्छे घाबनु कूँ भरि देऔ करै है। दाऊ अपनी घरबारी कूँ तोै नाँय भूलि पाये परि छोरा की द्वै साल की नन्ही-सी छोरी, जाकूँ सबु ‘छुटकी’ कहौ करें हैं, नें अपनी बाल लीलानुतें बिनकौं ध्यानु हटायकें, जीवन कूँ दूसरी धारा की लंग मोड़िबे कौ कामु जरुर करौ।’ जब बु अपनी नन्हीं-नन्हीं पैयानु तें चलिकें और नन्हें-नन्हें हाथनु की अंगुरियानु कूँ नचावत भये दाऊ कूं दादू-दादू पुकारौ करै है तौ सुरग कौं सारौ सुख बा समै दाऊ के हिय में समाय जायौ करै है।
एैसेई दिन बीति रहे हे कें एक दिना एक छोटी सी बात पें दाऊ के मन में ठेस सी लगि गई। भयौ जे केें घर-गिरस्ती की गाड़ी खींचत भये दाऊ नें कबऊ बैठि कें सुख नाँय भोगौ। पूरी उमरि बुं कोल्हू के बैल की तरियाँ गिरस्ती की गाड़ी में जुते रहे हे। कबऊ बालकनु की फीस तौ कबऊ किताब-कापी और कबऊ स्कूल ड्रेस कौ खरचैं तौ कबऊ घर-गिरस्ती कौ खरचु या फिर कबऊ काऊ की हारी-बीमारी में अचानचक आय परौ खरच या फिरि भात-छोछक कौ खरचों, याही तरियां पूरी उमरि बीति गई, एक पैसा हूँ नाँय जुरौ। दाऊ अपने लें कछु खरच करिबे की सोचि-सोचि कें ही रहि जाऔ करें हे। कबऊ चैन तें द्वै पैसा अपने ऊपर नाँय खरच करि पाये। अब आय कें छोरा की चाकरी लगि गई तौ दाऊ नें सोची चलौ अब घर कौ खरचै-पानी तौ छोरा चलाइ ही लैेबैगौ औरु मैं बेफिकर है कें अपनी पेंसन कौ पैसा बखत जरुरत के लैया जोरि सकूँ।
दाऊ कौ सोचै भयौ एकाध महीना ही चलौ होयगौं कें एक दिना अपने दफ्तर तें लौटिकें छोरा बोलौ कें बापू, जा मँहगाई नें तौ मेरी कमरि तोड़ि दई है। या समैं, ऐसों बखतु आय गयौ है कें घर के एक जने के कमायबे तें खरचैं पूरौ है बौ भौतुई मुसिकिल सौ है। मैं सोचि रहौ हो कें छुटकी हू अब ढाई साल की हैबे जाय रही है, याकूं अब काऊ अच्छे से स्कूल में पढ़िबे कूँ बैठानों परैगों। 
छुटकी कूँ अबई तें स्कूल में बैठायबे की बात सुनिकें दाऊ बिगरि परे-
‘‘अरे कहा कहि रहौ है तू? ढाई साल के बालक कूँ स्कूल भेजिबे की बात कहि रहौ है। अरे अबई तौ जाकी सोचिबे-समझिबे की क्षमता कौ विकास हू नाँय भयौ औरु तू जाकू स्कूल में भेजिबे की बात करि रहौ है। पतौ है पहलें बालक 5-6 साल तक तौ ऐसेई  घूमौ करै हे .......।
दाऊ की बात कूँ बीच में ही काटि दई राजन नें-‘बापू आपु तौ अपने जमाने की बात लैके बैठि जाऔ करौ हो। आपु के जमाने में हतु कहाओ जो सीखते। आजु देखौ, साइंस के चमत्कार ही चमत्कार दिखाई दैबैं हैं। याही तें बालक हू तेज बुद्धि के पैदा है रहे हैं। कैऊ बालक तौ द्वै-ढाई साल की उमरि में ऐसे-ऐसे करतब दिखाय चुके हैं कें बिनको नामु लिम्का बुक और गिनीज बुक तक में दरज है।
राजन कौ लम्बौ-चैड़ौ जि भाषण सुनि कें दाऊ खीजि उठे। अपनौ अपमान सौ महसूस भयौ तौ बोलि उठे, - 
ठीक है भैया, तोकूँ जो ठीक जंचै बू ही करि। तेरी छोरी है, द्वै साल की बैठा चांय ढाई साल की। मैं कौनु होतूं तोकूं बतायबे बारौ।’’
‘परि बापू, छुटकी कौ दाखिला करायबे के ताईं कछु पैसानु की जरुरत परैगी। अपनी पेंसन तें कछु सहायता करि देऊ तौ......
अब तौ दाऊ खीजिकें भड़कि ही उठे- ‘‘बस्स, याही प्रगति कौ बखानु करौ हौ कें भौतु प्रगति करि लई है मानुष नें। अरे मैंने छह-छह जने के कुनबा कूँ अकेले ही अपनी कमाई तें पढ़ायौ-लिखायौ औरु पालौै हो औरु तू अब अपनी घरबारी औरु नन्हीं सी छुटकी के संग मेरौं भरन-पोषन नाँय करि पाय रहौ, मैं हू अपनी पेन्सन तें कछू न कछू सहायता तौ करि ही दऊँ हूँ। अब का सारी की सारी पेन्सन ही तोकूं दै दौ करुँ? अपने बुढ़ापे कूं कछु नाँय बचाऊँ?’’
औरु फिरि खीजे भये दाऊ, राजन तें द्वै चारि महीना बाद लौटिबें की कहिकें अपने गाम चले आये हते। सोचि रहे हते कें द्वै चारि महीना गाम में रहिंगे फिरि एकाध महीना काऊ छोरी के पास चले जाबिंगे औरु ऐसेई घूमत-फिरत समै पास है जाबैगों।
य्हाँ आइबे के बाद दाऊ तें मेरी भेंट भई तौ बिनकी बातन कूँ सुनि-सुनि कें मोकू बिनतें सहानुभूति सी हैबे लगी ही औरु मैं सन्ध्याबन्दन के बाद रोजाना दाऊ के पास आयकेें एकाध घन्टा बिनके ढिंग बैठिकें गुजारिबें लगौ। अपने समै की भौतु सारी बातें, भौतु सारे खट्टे-मीठे अनुभव, दाऊ मोंकूँ बतायकें अपने आपु कूँ हलकौ सौ महसूस करै हैं; ऐसौ मोकूं लगौ। परि आजु दाऊ के कुम्हलाये भये म्हौड़े कूँ देखि कें मोकूं लगौ कें दाऊ छुटकी कूं भौतु प्यारु करै हैं औरु आजु सुधियनु कौ सैलाब उमड़ि परौ है। काहू तें चाहे कित्ते हू गुस्साय जाबैं परि छुटकी तें दूरि नाँय रहि सकें। छुटकी की मिसरी घुरी दादू-दादू की आबाज, दाऊ के काननु में आजु गंूजि रही है औरु जा बात कौ बस्सि एक ही हलु है - दाऊ की बापसी।
यानी- दाऊ की हालत जहाज के बा पंछी सरीखी ह्बै गई है जु समुद्र में उड़ान भरिबे के बाद, फिरि-फिरि जहाज पै ही बापस आय बैठै है - मेरौ मन अनत कहाँ सुख पाबै, 
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी 
फिरि जहाज पै आबै।

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बिधिना कौ लेखौ 

भैया जि प्रभू की लीला हू अपरम्पार है बिधिना नें जा ललाट में कहा लिखि दयौ है, कोऊ नाँय जानें है’’-रामहरी काका नें एक लम्बी सांस खींचत भये ऊपर नीली छतरी की ओर निहारौ ।
हाँ, जे तौ ठीक ही कहि रहे हौ काका । परि आजु जे म्हौड़े पै इत्ती उदासी कौ का कारन है? का काऊ तैं घर में कछु कहा-सुनी है गई है या और कछू बात है, 
‘‘नाँय , ऐसी तौ कछु बात नाँय है गिरधारी परि मैं कबऊ-कबऊ जा ऊपर बारे की लीलानु कूं देखि-देखि कें हैरान जरूर है जाऔ करूँ हँू जाकौ विधान कछु समझ में ही नाँय आबै जिन कूँ हम सबु भौतु ज्ञानी-ध्यानी, धरम परायण और भलौ मानुष समझें बुं ही भैातु सारे कष्टनु तें घिरे मिलै हंै और जिनकूं  जे सारौ जग बुरौ-बुरौ कहै बूं मौज लैते मिलै हैं, अब तू ही बता गिरधारी मेरौ कहिबौ कहाँ तलक ठीक ह।ै’’
‘काका, आपु कह तौ ठीक ही रहे हौ, जा बात कौ अचरज तौ कबऊ-कबऊ मैं हू करूं हूँ परि जा समै आपु कूं कौन सी बात याद आय गई जा नै आपु कूँ दुविधा में डारि दयौ है’- मैंने रामहरी काका के उदास म्हौड़े की लंग कूं निहारौ।
‘‘बात जि है भैया कें तू रामऔतार कूं तौ अच्छी तरियाँ जानैं ही है’’- काका नें सामनें सून्य में निहारत भये कहिबौ सुरू करौ
‘हाँ, चांै नाँय, रामऔतार कूं खूब अच्छी तरियाँ तें जानूं हूँ काका, बड़ौ भलौ मानुष हैै बिचारौ’
‘‘हाँ तौ गिरधारी फिरि तू बाके दुखी है बे के कारन कूँ हू जान्तु होयगौ भैया?’’- काका नें अब मेरी लंग कूं देखौ।
’हाँ काका, जब तें रामऔतार की घरबारी भगवान कूं प्यारी भई है तबई तें बेचारौ भौतु दुखी रहौ करै है।’
‘‘घरबारी के मरिबे तें तौ दुखी है ही बा के अलाबा हूँ औरु कारनु है जा नें रामऔतार कूँ तोरि कें धरि दयौ है’’- काका नें ऊपर कूं हाथ जोरे-‘‘ सबु बा ऊपर बारे की लीलानु कौ खेलु है भैया गिरधारी, नाँही तौ आजु के जमाने में ऐसौ भलौ मानुष और ऐसी पीड़ा पाय रहौ है’’
‘बंू कहा कारनु है काका? नैक मोकूं हू बताय देउ’- रामऔतार के दुखी हैबे कौ कछु औरु हूं कारन है मोकूं जे नाँय पतौ हो सो मैंनें काका तें निहोरौ सौ करौ।
बात जि है भैया कें जि ऊपर बारौं जब काहू कूं दुख दैनों चाहें है न, तौ बाकी भूमिका बा मानुष के जीवन में भौतु पहलें तें ही रचि डारे है। रामऔतार के संग हू बानैं ऐसी ही एक लीला भौतु पहलें ही रचि दई ही। भयौ जे कें रामऔतार के कोऊ सन्तान नाँय हती, याही तैं रामऔतार की घरबारी भौतु दुखी रहिबौ करै ही। बुं एक सन्तान पायबे के लै, रामऔतार के आगें भैातु सारी बातनु कौ दबाबु बनायौ करै ही, जैसें कें भौतु सारे साधू-महात्मनु के पास रामऔतार कूं लै जाऔ करे ही या फिर जहाँ कहूं जा काहू तें जो कछु सुनि लैबें ही बुं ही टोना-टोटिका करिबे कूं बुं रामऔतार तें कहौ करै ही, रामऔतार ठहरौ पूजा-पाठ औरु ऊपर बारे के भरोसे रहिबे बारौ, बूं अपनी घरबारी कूं खूब ही समझाऔ करै हो कें देखि जब ऊपरबारे कूं तेरी गोद हरी करनी होयगी तौ बुं जरूर ही करैगौ औरु बाकँू जि नाँय मंजूर है तौ तू कित्ते हू खटराग कराय ले मोतें, कछु नाँय होयगौ, परि भैया गिरधारी तू तौ जानें है कें तिरिया हठ और बाल हठ के आगे काहू की हू नाँय चले है।
‘हाँ सो तौ आपु ठीक ही कहि रहे हौ काका, फिरि का भयौ काका’?
‘‘फिर जे भयौ कें ऊपर बारे नें एक लीला रची, रामऔतार के संग कामु करिबे बारे किसनुआ की घरबारी अपने एक दुधमुंहे छोरा कूं छोड़ि के ऊपर बारे कूं प्यारी है गई। रामऔतार की घरबारी कूं जब जा बात की सल परी तौ बानें रामऔतार तें चिरौरी करी कें जा छोरा कूं मैं पारि लुंगी, जाकूं पालनहार मिलि जाबैगों औरु मेरी गोद में एक बालकु आय जाबैगौ। रामऔतार नें भौतेरौ समझायौ परि घर बारी नाँय मानी तौ रामऔतार नें बा छोरा कूं गोद लै लीनौ।’’
‘जि काम तौ रामऔतार की घरबारी नें अच्छौ ही कीनौ हो काका, बिन माँ के छोरा कूं, माँ की गोद मिलि गई’।
‘‘हाँ कह तौ तू ठीक ही रहौ है गिरधारी, परि ऊपर बारे कूं तौ कछु और ही लीला रचनी ही, सुनि फिरि आगें कहा भयौ’’
‘हाँ सुनाऔ काका, फिरि का भयौ’’
‘‘फिरि जे भयो कें कछू महीना बाद रामऔतार की घरबारी के पाम हू भारी है गये, औरु नौ महीना बाद बाके हू अपनौ एक छोरा आय गयौ, अब दोऊ छोरा रामऔतार के घर में संग-संग बढ़िबे लगे। दोऊ की बाल क्रीड़ानु कूं देखि-देखि कें रामऔतार औरु बाकी घरबारी खूब ही प्रसन्न हे, कहाँ तौ ऊपरबारे नें अब तलक घर सूनौ रखौ हो औरु अब दये तौ द्वै-द्वै छोरा दै दये।
‘हाँ काका, जि तौ अच्छी लगिबे बारी बात ही है’
‘‘हाँ गिरधारी, है तौ अच्छी लगिबे बारी ही बात, परि भैया आगें सुनि कहा भयौ,    
कोई पाँच बरस बीते हुंगे के एक दिना रामऔतार की घरबारी दोऊ छोरानु कूं लैं कें अपनी मैया के संग आगरा तें मथुरा आय रही ही, मथुरा में घुसिबे के बाद कचहरी तक ही आई हती कें बिनकी बस दूसरे वाहन तें टकराय गई, बस्स वाही समै सारौ खेल खतम है गयौ, रामऔतार की घरबारी, बाकौ कोख जायौ छोरा और सास तीनों बाही ठौर ऊपरबारे के पास पौचि गये, परि गोद लये छोरा कूं कछू हू नाँय भयौ।
खबरि सुनिकें  रामऔतार तौ चक्कर खाय कें गिरि परौ, होस आयौ तौ सिर पकरि कंे बैठि गयौ अब कहा करौ जाय?
कहावत है कें ’’समै कौ मरहम बड़े तें बड़े घावनु कूं हू भरि दैबें है’’सो भैया समै के संगई रामऔतार नें हू अपने मन में धीर धरि लई औरु फिरि बाय गोद लिये छोरा कूं जाकौ नामु रामऔतार की घरबारी नें राजन धरौ हो, बाप औरु मैया, दोऊ बनिकें पालन-पोषन करिबे लगौ 
राजन के पारिबे-पोषिबे में रामऔतार नें कोई कमी नाँय छोड़ी ही, खाइबे-पीबे औरु पहरिबे-ओढ़िबे के अलाबा अच्छे तें अच्छे स्कूल में बा कूं दाखिला हू कराय दियौ परि तकदीर के लेखे कूँ कहाँ लै जाबैगो कोई, राजन कुसंगति में परि गयौ। बाकूं नसीली चीजनु कौ चसका लगि गयौ, रामऔतार तौ जाबै अपने दफतर कूं और राजन घर तें स्कूल के नाम पें पहौचि जाय नसेड़िनु के ढिंग। रामऔतार दफ्तर तें लौटें तौ राजन हू घर आ जाबै, परि कछू दिना बाद जब नसा की लत बढ़ि गई तौ राजन नें घर कूं देर तें आइबौ सुरू करि दीयौ। रामऔतार देर तें आइबे कौ कारन पूछें तो कछू न कछू बहानौ बनाय दैबों करै।
एक दिना रामऔतार कूं एक बड़े से बासन की जरूरत परी, बानें बासननु के बक्सा कूं खोलों तौ बुं तौ देखि कें हक्का-बक्का र्हैै गयौ, बासननु कौ बकस खाली परौ हो, जामें धरे इत्ते सारे बासन आखिर गये कहाँ। जे बात रामऔतार के दिमाग में नाँय आय रही ही। आखिर में बानें राजन तें पूछी तौ बुं अनजान सौ बनि गयौ। परि रामऔतार कूं कछु सक सौ है गयौ औरु बानें सिगरे बासननु के गायब हैबे के भेद कूं जानिबे कौ बीड़ा उठाय लयौ।
एक दिना रामऔतार सिर दुखिबे कौ बहानौ बनाय कें घर में ही खेस ओढ़ि कें सोइ रहौ, राजन नें सोबत भयौ जानि कें अपने स्कूल के बैग में रसोईघर तें एक पीतरि की प्लेट निकारि कें रखि लई फिरि लाला की दुकान पै जाय पहुँचैं, रामऔतार हू बाके पीछें-पीछें सबु देखि रह्यौ हो, बस लाला तें सिगरी पोल-पट्टी खुलि गई। रामऔतार नें कड़़ाई तें पूछी तौ राजन नें रोबत भये सारों किस्सा बताय दयौ, कैसें स्कूल में बानें नसा करिबौ सीखौ औरु घर के सिगरे बासननु कूं कहाँ-कहाँ बेचै। रामऔतार नें अपनों माथो पकरि लयौ, कहाँ कमी रह गई राजन के पालन-पोषन में। बानें तौं बाप औरु मैया दोऊ की कमी महसूस नाँय होन दई ही राजन कूं फिरि ? जा फिरि कौ कोऊ जबाबु रामऔतार कूंँ नाँय मिलि पाय रहौ हो, तौ भैया गिरधारी, अब तुमही बताऔ कें ऊपर बारे कौ खेल-तमासौ कोऊ समझि सकें है’’ 
‘‘ठीक कहि रहे हौ काका, कोऊ नाँय समझि सके’’- काका की बातनु में मैं ऐसौ डूबि गयौ हो कें काका के पूछिबे पैं चैकि उठौ,-‘‘फिरि कहा भयौ काका, फिरि राजन में कछू सुधार भयौ कें नाँय’’
सुधार का भैया, रामऔतार नें राजन कूं नसा मुक्ति बाल सुधार केन्द्र में भरती कराय दियौ है, सूनों-सूनों घरु रामऔतार कूँ काटिबे कूं दौरें है, परि बुं राजन के ठीक हैबे की उम्मीद में जी रह्यौ है, अब आगें ऊपर बारे की जो मरजी होय, बाकी लीलानु कौ कोऊ पार थोरौई पाय सकें है भैया!

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अब पछताये होत का?

अपने छोरा  भानू की घरबारी की बात सुनिकें सुमन भौचक सी देखिबे लगी। बाकूं लगौ कें ऐसे जीबे तें तौ मरि जाइबौ भलौ है। कैसो टका सौ जबाब दै दियौ भानू की घरबारी नें। अबई ठीक तें पूरौ एक बरस हू नाँय भयौ है भानू के ब्याह कूं और बाकी घरबारी कूं देखौ, कैसी कंैची सी जुबान चलाइबे लगी है।
सुमन बड़बड़ाइबे लगी ही परि बा की अन्तरआत्मा तें हू एक अबाज उठिबे लगी ही। बुं सोचिबे लगी कें पुरानी कहाबतनु में कित्तौ सच भरौ परौ है। हमारे पुरिखानु नें बड़े ही अनुभबनु तें जि कहाबतनु कूं लिखौ होयगौ-‘‘इतिहास अपने आपु कूं दुहराइबौ करै’’, औरु ‘‘जैसी करनी, बैसी भरनी’’ या फिर ‘‘ करनी कौ फलु भोगनौ ही परै है सबकूँ’’।
सुमन की अन्तर आत्मा तें उठि रहीं जि आबाजें बा कूं अपने अतीत में लै जाइबे कूं मजबूर करि रहीं हीं। कोउ बत्तीस बरस पहलें की तौ बात है। तब सुमन की उमरि कोउ 20-21 बरस की होइगी जब बूं ब्याह कें जा ड्यौढ़ी पै चढ़ी हती। जौवन कौ अल्हड़पन बाके अन्दर कूटि-कूटि कें भरौ हो। सासुरे में आयकें बानें अपनौं खूबई मनमानौं ब्यौहार सुरू करि दीनौ हौ। मइया-बाप नें बिदा करत समैं बाकूं एक हू नसीहत दैबे की जरूरत महसूस नाँय करी ही कें धीय,अब तुम अपनौ मायकौ छोड़ि कें सासुरे में जाय रही हौ तौ अपनी सासुल और ससुर कूं हूँ अपने मइया-बापू की तरियाँ ही सम्मान दैबौं करियौ। धीय, जा मानव देह कौ सबतें बड़ौ बैरी बाकौ आलस होबै है। जा आलस कौ जानें त्याग करि दीनों, बानें समझौ कें सारों जग अपनौं करि लीनौ।
अब जोबन के उफान पै बुं इन बातनु कूं अपने आपु कैसें सीखती? बुं तौ बाढ़ आई नदी सी जोबन की लहरनु में बही जाय रही ही। जब बाकें मइया-बापु नें ही बाकूं कछु नाँय सिखायौ तौ फिरि बुं अपने सासुरे में आयकें सास-ससुर की नसीहतन कूं चैं अपनाबती। बिनकी बातनु कूं एक कान तें सुनती और दूसरे तें निकारि देबैई। बाकी सास जब बाके सिर पै अपनौ हाथ फेरत भये बाकूं समझाइबे की कोसिस करै ही कें ‘‘भानू की घरबारी, भोर में सूरज के निकसिबे तें पहलें जागिबौ, लच्छमीनु कौ कामु होबै है। सूरज निकसिबे के बादउ बिस्तर पै परे रहिबे तें सेहत खराब होऔ करै है और घर में दरिद्रता फैलौ करै है।’’ तौ बुं अपनौ म्हौड़ौ बिचकाय के , भोर में दिन चढ़े तक बिस्तर नाँय छोड़ौ करै ही।
सुमन कूं अपने विगत कौ एक-एक पल चलचित्र की तरियाँ सामनें घूमत भयौ दिखाई दैबे लगौ। बिना काहू बात के बाकूं अपने सास-ससुर तें चिढ़ सी हैबे लगी ही। बुं दोनों सुमन कूं जित्तौ सहारौ दैबे हे बुं उत्तौ ही जियादा मक्कारी करौ करै ही। सूरज चढ़े तक बिस्तर तैं नाँय उठौ करै ही। घर में झाड़ू-बुहारी न तौ खुदि ही करौ करै ही और न काउ काम बारी कूं ही काम पैं टिकिबे दैबै ही। काम बारी तैं कोउ न कोउ ऐसी बात जरूर करि दैबे ही, जा तें कामबारी काम छोड़िकें भागि जाबै। 
सास बिचारी ,घर की इज्जत बनी रहै या तें खुदि ही झाड़ू-पौछा औरु बरतननु कूं मांजि कें धरि दैबें ही। सासु कूं घर के कामनु में लगौ देखिकें बाकूं भीतर ही भीतर बड़ौ सुख महसूस होऔ करैओ। उमरि के लिहाज तें सासुल की सारीरिक क्षमता अब इन कामनु लाइक नाँय है जि जान्त भये हू बुं अनदेखौ करि दैबे ही। एक बेरि बाकी सासुल बीमार परि गई। कैउ दिना तक बुखार में तपत भये बिस्तर तें हू नाँय उठौ गयौ तौ झाड़ू-पौछा कौन करतौ। परि बानें न तौ अपनी सासुल की तबियत के बारे में ही पूैछिबौ जरूरी समझौ औरु न घर कौ झाड़ू-पौछा ही करौ। झूठे बर्तन हू रसोई में इकट्ठे है गये, परि बानें झूठे बरतनु तें हू हाथु नाँय लगायौ तौ बाके ससुर नें अपने पास बैठाय के कछु पुरानी कहाबत बाकूं बताईं। जि हू कें बहू ऊपर बारे नें जा मानव जीवन कौ बड़ौ ही सुन्दर तारतम्य बनायौ है। यामें पुरानी पीढ़ी उमरि बढ़िबे के संगई धीरें-धीरें अपनी काम करिबे की क्षमतानु कूं खोयबौ करै है और बाही के संग,नई पीढ़ी यानी घर के बेटा-बहू आय कें बिन कामनु कूं धीरें-धीरें अपने ऊपर लैनौं सुरू करि दैबैं हैं औरु या तरियाँ घर के बुजुर्ग बहू-बेटानु कूं घर की जिम्मेदारिनु कूं सौपि कें खुद बिन तें मुक्त है जाऔ करैं है। जु काम बिननें अपनी ज्वानी में करे हतैये बिनकूं बेटा-बहू करिबे लगैं हैं औरु बड़े-बूढ़े अपने पूरे जीवन के अनुभबनु कूं अपने बेटा-बहून कूं बतायकें उनकूं ऊँच-नीच बातनु तें साबधान करि दैबें। याही तरियाँ समैं बीतिबौ करै हैं और फिरि अगली पीढ़ी पै जि सारी जिम्मेदारी समै के संग-संग अपने आपु ही चली जाबै है। अब तुम जा घर की बहू हौ,तिहारे सरीर में जु ताकत है बुं अब हमारे सरीर में नाँय है। यातें अब जा घर कूं अपनौं समझि कें ,उन जिम्मेदारिनु कूं अपने आपु सम्भाएै औरु हम दोउनु कूं अब मुक्ति दै देउ। अब जि कामु हमारे बस के नाँय रहे।’’
जि सारी बातनु कूं अपने ससुर के म्हौड़े तें सुनिकें सुमन नें बिनके म्हौड़ें कूं निहारौ। बिनके म्हौड़े पै एक बेचारगी भरी बिबसता देखि कें सुमन कूं थोड़ी देर के लैं तौ लगौ जि सारी बातें सही हैं, अब इनतें कछु कामु करबायबौ, इनके संग अन्याय होयगौ।
परि दूसरे ही पल बुं सब बातनु कूं हवा में उड़ाय कें अपने कमरा में जाय घुसी तौ फिरि ससुर नें ही पूरे घर में झाड़ू-बुहारी करि दई। कैऊ दिना में इत्तौ कूड़ौ इकट्ठौ है गयौ हो के चलत में बिनके पैर किसकिसायबे लगै हे। ससुर कूं झाड़ू-बुहारी करत भये देखिकें हू बु कछु नाँय बोली तौ ससुर नें कैउ दिना तैं रसोई में पड़े झूठे बरतननु कूं हू माजि दियौ। परि बिनके हिय में एक हूक सी उठिबे लगी कें -हे प्रभो! का याही दिना के लैं आदमी सन्तान की इच्छा करै है? ऐसी सन्तान तें तौ बिन सन्तान के भलौ। अपनी घरबारी के निकम्मेपन कूं देखिकें हू जब बेटा कछु नाँय कहि रहौ, सब कछु देखत भये हू अपनी घरबारी के ही पक्ष में खड़ौ भयौ है तौ जरूर ही जे बाके पूरब जनमनु कौ लेखौ-जोखौ है। नाहीं तौ बेटा की परबरिस में अपने जान्त भये तौ कहँू कोउ कमी छोड़ी हती नाँय ही बानें। परि कारी मंूढ़ बारी के आबत ही जि-‘‘काग पढ़ाये पींजरा’’ बारी बात कैसें है गई?
सुमन कूं अब बा समैं की एक-एक सुधि लौटि रही है। बाके ससुर नें औरु हू कई बार बाकूं समझाइबे की कोसिस करी हती, परि बाके भीतर तौ कुसंस्कारनु कौ उन्माद उफान पै हो। कोउ सीख की बात तौ बा बखत बाकूं नीकी लगौ ही नाँय करै ही।
ससुर की एक बात की बाकूं सुधि आय रही है। बुं कहौ करैए-‘‘जा काया में अमरित कूप भरे, जाही में तौ अगनि जलत है, याही में बाग हरे’’ यानि मानुष के जा सरीर में अमरित कौ भण्डारु है,कब? जब बुं सतकरम करै, आलस कौ त्याग करै, अपने तैं बड़ेनु कौ आदर-सतकार करै तौ चारौ लंग लहलहात भये हरे बाग हैं औरु जा के बिपरीत चलै तौ याही में तौ अगनि जरत है यानी द्वेष,मन-मुटाब,लड़ाई-झगड़े,क्लेस, दारिद्रय,दुसमनी सब जा सरीर तैं पैदा है जाबैं हैं। परि सुमन तौ बा समैं काहू औरु ही दुनिया में जी रही ही। बा पै इन सारे उपदेसनु कौ असरु थोरी सी देर कें लैं ही हैबै करै हो। सुमन के ऐसे ब्यौहार तें दुखी है कें बाके ससुर नें अपने कमरा में मोटे-मोटे अक्षरनु में लिखि कें टांगि लियौ हो कें-‘‘काहू तें अपेक्षा करिबौ, सबतें बड़ौ दण्ड है।’’
औरु फिरि बाके बाद बिननें मौन धारण करि लीनौ हो। न काहू तें कछु बोलिबौ और न काहू कामकी कहिबौ। न डाटिबौ न सलाह दैबौ। बस्स जित्तौ अपने सरीर तें है जाबै,उत्तौ करि दैनौ।
कहौ करैं हैं कें बेटा कित्तौ हू कपूत निकरि जाय परि माँ-बाप अपनी सन्तान कूं बद्दुआ नाँय दैबौ करैं। परि अब सुमन कूं लगि रहौ है कें भले ही ससुर नें कछु कहिबौ-सुनिबौ बन्द करि दियौ होय परि बा उमरि में जब बुं काम करत-करत थकि कें कमरि सीधी करैं हे तौ पीड़ा की परतें बिनके म्हौड़े पै साफु झलकौ करैहीं और बा समैं जरूर ही बिनके दिल तें बद्दुआ ही निकरती होंयगीं के जैसों तुम हमारे संग आजु करि रहे हौ,कल्लि कूं तिहारे बहू-बेटा हू एैसौ ही करिंगे तब तुमकूं जि समै यादि आबैगौ। तबई तौ सुमन कूं रहि-रहि कें आजु जि सिगरी बात याद आय रही हैं।
एक बेरि बिननें थकि जायबे के बाद अपने आप तें ही बतराबत भये कही ही कें-
‘‘सपने मति देखौ करौ,इनकौ ओरु न छोरु
दूरि भौतु लै जांगे,थामें रखियौ डोर
थामें रखियौ डोर, पराये हौं या अपने
टूटौ है इनसान, अगर टूटे हैं सपने।’’
बिनकी बा समै की सारी पीड़ा कौ भान सुमन कूं जा समै है रहौ है, जब बुं समैं भौतु पीछें छूटि चुकौ है। अपने सास-ससुर की जगै बानै खुदि और बाके घरबारे नें लै लई है और भानू और बाकी घरबारी नें बाके घरबारे और बाकी जगै। भानू की घरबारी की कठोर बानी सुनिकें सुमन की रूह काँपिबे लगी है। अब बुं अपने सास-ससुर के संग करे अपने करमनु कूं यादि करि-करि कें आँखिनु तें झर-झर आँसू गिराऔ करै है सोचत भये कें आजु बा के सास-ससुर बाके सामनें आय जांय तौ बुं बिनके पैर पकरि कें बिनतें अपनी भूलनु की माफी माॅगि ले, परि बु समै तौ भौतुई पीछें छूटि गयौ। अब पछताये होत का, जब चिड़ियाँ चुगि गईं खेत.....

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आब नहीं आदर नहीं


उपेन्द्र दादा के बारे में सुनिकें मैं भौंचक सौ रहि गयौ। कहा भयौ, कैसें भयौ जैसे कैऊ सबाल मैंने नीरज तें एक ही साथ करि डारे।
मेरी आतुरता देखि कंे नीरज नें हू बिना कोऊ भूमिका बांधे, मोकूं बतायौ के उपेन्द्र दादा द्वै मास तें अपने बड़े छोरा के ढिं्रग बड़ौदा में हे परि बड़ौदा में बूं कछु अस्वस्थ से है गये तौ लोटिकें बापस हियां आय गये हते। हियां आइबे के बाद एक दिना नित्यक्रिया कूं गये हते कें, चक्कर खाइकें गिर परे। सिगरौै म्हौड़ों फूटि गयौ, सरीर खून-खच्चर है गयौ और भौतु देर तक बूं बाही जगै पै पड़े रहे, बेहोस से।
नीरज अपनी बात कूँ पूरी हू नाँय करि पायौ हो कें मैंने बीच में ही रोकि दियौ- ‘‘सुनि भैया, नीरज तोकूं बीच में ही रोकि रहौ हूँ पहलें मेरी बात कौ जबाबु दै दैं कें तैनें जि कहा बात कही कें द्वै मास तें अपने बड़े छोरा के ढिंग हे और कछु अस्वस्थ ह्बै गये तौ हियां वापस आय गये। जि बात तौ कछु गरे तें उतरि नाँय रही भैया। अस्वस्थ है बे पै छोरा के ढिंग जानौ हों या अस्वस्थ हैबे पै हियां आनौ हो? अरे हियां उनको कौनु है जो देखभाल करैगौ। बिनकी उमरि की ही बिनकी घरबारी है। जा बुढ़ापे में का बूं बिनकी देखभाल करि पाबैगीं?
हाँ जि तौ तिहारौ कहनौ बिरकुल सही है काका, परि जब छोरा और बाकी घरबारी कौ कोऊ सहारौ ही न मिलै बिनकूँ तौ कहा बड़ौदा रहिबौ और कहा हियां रहिबौ, बिनकूं तौ दोऊ जगै एक ही समान हैं।
‘‘का मतलब, तू कहिबौ कहा चाहि रहौ है नीरज, तनिक मोकूँ खोलिकें बता भैया।’’
बात जि है काका कें उपेन्द्र दादा के दोऊ छोरानु नें अपनी-अपनी पसंद की छोरी तें ब्याह करो हो, जि बात तौ तिहारी जानकारी में है न? अब भयोै जि कें उपेन्द्र दादा नंे छोरानु की जा बात तें अपनी नाराजगी जताई और कैऊ बरस तक दादा की नाराजगी के कारन छोरा अपनी-अपनी घरबारिनु कूँ लैंकें बिनके पास नाँय झाँके। कैऊ बरस बाद जब छोरानु के हूँ एक-एक छोरा है गयौ तौ बूं दादा के पास अपने छोरानु कूँ और घरबारीनु कूँ लैकें आये और सबनु नें दादा तें माफी माँगी।
दादा और बिनकी घरबारी नें अपने छोरानु के नन्हें-नन्हें छोरानु कूं ढुमकि-ढुमकि चलत देखौ तौ पसीजि गये और दोऊनु नें दोऊ छोरा और बिनकी घरबारीनु कूँ माफु करिकें, नन्हें-नन्हें नातिनु कूँ अपनी गोद में उठाय लियौ।
हौलें-हौलें करिकें समै बीतिबौ करौ। उपेन्द्र जी के एक छोरा कौ तबादलौ दिल्ली है गयौ तौ दूसरे कौ आगरा और याही बीच उपेन्द्र जी हू अपनी नौकरी तें सेवानिवृत्त है गये। उपेन्द्र जी के पास अब समै ही समै हो सो बु अब अपनी घरबारी कूँ लैकें कछु दिना आगरा बारे छोरा के संग रहि आये तौ कछु दिना के लैं दिल्ली बारे छोरा के संग। याही तरैं सेवानिवृत्त जीवन बीति रहौ हो। हियाँ के लम्बे-चैड़े मकान के कछु कमरानु कूँ बिननें किराये पै उठाय रखौ हो सो छोरानु के पास जाइबे पै घर की रखबारी की दिक्कत हूँ बिनकूँ नाँय होऔ करै ही। परि काका जा ऊपर बारे कौ बिधानु ऐसौ है कें जाकूँ कोऊ नाँय समझि सकै। कब कौन के जीवन में कौन सौ मौडु आबैगौ। कौन कूँ कौन सौ सुख और कौन कूँ कौन से दुःख कौ सामनौ कब करनौ परैगो, कोऊ नाँय जानें है।
‘‘हाँ सो तौ तू ठीक कहि रहौ है नीरज। ऊपर बारे की लीलानु कूँ कोऊ नाँय समझि सकै है। फिर का भयौ नीरज?’’
फिरि काका, जे भयौ कें दादा कौ छोटौ छोरा अपने देस की चाकरी छोड़ि कें परदेस चलौ गयौ। कछु दिना बाद बानें अपनी घरबारी और अपने छोरा कूँ हूं परदेस में ही बुलाय लियौ तौ अब दादा के पास हियां और अपने बड़े छोरा के पास रहिबे के सिवा कोऊ चारौ नाँय बचै। जब तलक दादा और बिनकी घरबारी कौ मन करे बूँ हियां अपने बनाये मकान में रहौ करें और जब मन भरिबे लगें तौ बूं अपने बड़े छोरा के पास आगरा चले जाऔ करैं। 
‘‘ठीक ही तौ है, अब बुढ़ापे में बूं परदेस तौ जाइबे तें रहे। अपने देस में ही बड़े छोरा के ढिंग जाय सकैं।’’
हाँ काका, तिहारी जि बात सोलह आना सच है, परि काका जा बात कूँ आजकल्ल की पीढ़ी हूँ समझै तब न? छोटे छोरा के परदेस जाइबे के बाद जि भयौ कें, बड़े छोरा की घरबारी कूँ अब दादा और बिनकी घरबारी यानि अपने सास-ससुर बोझ से दिखाई दैबे लगे। बड़े छोरा की घरबारी अब काहू न काहू बहाने तें जि प्रगट करिबे लगी कै छोटो तौ छोड़ि-छाड़ि के परदेस भागि गयौ अब बू अकेली ही चैं सिगरौ बोझा ढोबै, बानें का दोऊ जनेनु कौ ठेका लियौ है जनम भर कौ। जि बात जब दादा के काननु में परी तौ बिननें बड़े छोरा के हियां जानौ हू बन्द करि दियौ। कैऊ बरस तक बूं बड़े छोरा के हियां आगरा नाँय गये। जिन छोरानु के पालन-पोसन में बिननें कोऊ कसर बाकी नाँय रखी ही बिनही छोरानु नें दादा के हिरदें पै पहलौ आघात तब करौ हो जब बूं दोनों अपनी-अपनी पसन्द तें ब्याहु रचाय लाये हे। बा आघात के बाद दादा कैऊ बरस तौ गुमसुम से ही रहे हे। पूरे मौहल्ला-पड़ौस और समाज में दादा की जो इज्जत ही, बिनके छोरानु नें बाकौ कोऊ लिहाज नाँय करौ।
दादा ने घर-परिवार और समाज में अपने बल पें ही अपनी इज्जत बनाई हती। घोर गरीबी के दिनन में हूँ बिननें अपने छोरानु कूँ अपनी गरीबी कौ अहसास नाँय होन दियौ हो। चाहें कहूं तें हूँ इन्तजाम करते, छोरानु की पढ़ाई की फीस और कपड़ा-लत्ता सब कछु कौ इन्तजाम समै पै बू करौ करै हे, परि अब द्वै-द्वै छोरा मिलिकें हूँ बिनकौ भरण-पोसन करिबे में अपने कूँ समरथ नाँय पाय रहे हे। दोऊनु कूँ बोझ लगिबे लगे, अब अपने सास-ससुर, मइया-बापू। बाह रे नई पीढ़ी। बेहयाई की सारी हदें पार करि दई हैं। बूढ़े मइया-बापू जिनकूं अब बिनके सहारे की जरूरत है, ऐसे समै पैं बिनकूँ आँखि दिखाय रही है। जोबन के जोस में पूरी तरियां मदमस्त नई पीढ़ी भूलि रही है कें बूं जितनौ अपने बुजरगनु की अबहेलना करैगी, बातें ज्यादा सन्तान, आइबे बारे कल में बिनकी अबहेलना करैगी। आजु बू अपने मइया बापु, सासुल-ससुर कूँ द्वै बखत की रोटी दैबे में आना कानी कर रहे हैं कल्ल कूँ बिनकी सन्तान, बिनें भूखौ मारैगी। तब मूढ़ पकरिकैं रोइबे और पिछली बातनु कूँ यादि करि-करिकें पछताइबे के सिवा, कछु हांसिल नाँय होयगौ। 
‘‘जितौ तू बिरकुलई ठीक कह रहौ है नीरज। एक कहावत है-‘‘कै इतिहास अपने आपु कूँ दुहराइबौ करै है।’’
हाँ काका, तिहारी बात सही है परि तुलसी बाबा ने बतायौ है कें मूरख के हिरदंे में चेतना नाँय जागौ करें भले ही साक्षात ब्रह्मा ही गुरू बनकें बाय चैं न समझाबैं। ‘मूरख हृदें न चेति जो गुरू मिलें बिरंचि सम’’ और आजु कल्ल की पीढ़ी में आधे तें जियादा मात्रा ऐसे ही लोगनु की है। फिरि जि कलजुग कौ हू प्रभाउ है। नाहीं तौ मइया-बापू के ऋण तें कोऊ उऋण है सकै है कबऊ? जितेक दुख, मइया-बाप, अपने छोरा-छोरीनु के लालन-पालन में उठाबैं हैं बिनकी तुलना तौ करी ही नाँय जाय सकै। पूरी जिन्दगी मइया-बाप की सेवा करैं तौ हू नाँय। परि जब अपनौ कोख जायौ ही अपने मइया-बापु की सेवा नाँय करनौ चाहै तो बूं कारे मूंढबारी तौ दूसरे घरकी है, बाकूं कहा लगाब होयगौ अपने सासुरे तें, अपनी सासुल तें और अपने ससुर तै। बाकूँ तौ थोड़ी सी सह मिली चहिए अपने घरबारे की लंग तें। बूं एक समै की हू रोटी बनाय कें नाँय दे बिनकूँ।
‘‘हाँ, नीरज, तू कह तौ ठीक ही रहौ है भैया। संसार में चार सुख बताये हैं हमारे पुरखनुनें-
पहलौ सुख, निरोगी काया, दूजौ सुख हो घर में माया
तीजौ सुख सुत आज्ञाकारी, चैथो सुख भार्या अनुगामिनी।
जाके पास जि चारों सुख होंय, बूं तौ राजा है जा संसार में। परि भैया, ज्यौं-ज्यौं उमरि बीतै है, पहलौ सुख तौ अपने आप ही, कम हैबे लगै है बुढ़ापे में।
हाँ काका, ज्यौं-ज्यौं दादा की उमरि बड़ि रही ही त्यौं-त्यौं सरीर के अंग हूँ साथ छोड़िबे लगे हे और ऐसे में छोरानु कौ और बिनकी घरबारीनु कौ ब्यौहार दादा कूँ भीतर ही भीतर खाय रहौ हो। दादा ठहरे स्वाभिमानी जीब। बिननें ठान लई कें बुं अब काहू छोरा के पास नाँय जाबिंगे।
‘‘ठीक कियौ। स्वाभिमानी मानुष तौ ऐसौ ही करैगो नीरज। पर एक बात बता भैया, कें दादा फिरि बड़ौदा कैसें पौंचि गये?’’
काका की बात सुनिकें मैंने बिनके म्हौडे़ की लंग कूँ निहारौ। बूं दादा के बारे में भौतु ही चिन्तित नजर आय रहे हे। अपनी जानकारी के अनुसार मैंने काका कूँ बताइबौ सुरू करौ-भयौ जे काका कें दादा भौतु बरस तक अपने बड़े छोरा के ढिंग आगरा नाँय गये। छोरा औरु बाकी घरबारी नें हूँ बिनकी सुधि नाँय लई। परि कैऊ बरस बाद बड़े छोरा कौ बड़ौदा कूँ तबादलौ है गयौ तौ बानें बड़ौदा में ही जमीन खरीद कें अपनी कोठी बनाय लई। दादा फिरिऊ कैऊ बरस तक बड़ौदा नाँय गये तौ छोरा ने बड़ौदा तें दादा कूं चिट्ठी लिखी। फिरिऊ दादा नाँय गये तौ बड़े छोरा ने बड़ौदा तें अपने छोरा कूँ भेजों। अपने नाती के आग्रह कूँ दादा टारि नाँय सके और बूं अपनी घरबारी कूँ लैंके नाती के संग बड़ौदा चले गये।
‘‘फिरि का भयौ नीरज? फिर दादा बडौदा तें चैं आय गये?’’
फिरि जे भयौ काका कैं दादा के बड़ौदा पौंचिबे के बाद 4-6 दिना तौ छोरा नें अपनी कोठी में अपने मइया-बापू को रखौ, द्वै बखत कौ खानौ हूँ बाकी घरबारी ने बनाय कें खिलायौ परि बा के बाद छोरा की घरबारी नें नखरे दिखाइबौ सुरू करि दियौ। घर में चिख-चिख है बे लगी तौ दादा ने कही कें भैया अब हमकूँ बापस जानौ है। तुम रहौ सुख तें।
परि दादा 6-7 दिनान में ही चैं बापस आय गये, सोचि-सोचि कें लोग-लुगाई हँसी-ठट्ठा करिंगे, जि सोचिकें छोरा ने बिनकूँ अपने पड़ौस में ही एक मकान किराये पै लै दियौ। अब काका, मकान तौ किराये पै लै दियौ परि खाइबे पीबे कौ कोऊ बन्दोबस्त नाँय करौ। ऐसे में दादा बीमार हूँ है गये। सो बिननें सोची कें द्वै बखत के खाइबे-पीबे कौ बन्दोबस्त हूँ जब हिंया नाँय है पाय रहौ तौ बीमारी में तीमारदारी को करैगो। सो काका, चल खुसरो घर आपने....... दादा ऐसी हालत में बड़ौदा तै बापस आय गये।
अच्छौ कियौ नीरज, आजु की पीढ़ी अपने बुजर्गनु कूँ जो दिन न दिखाएं सो ही ठीक है। तुलसी बाबा लिखि गये हैं- ‘‘आब नहीं आदर नहीं, नैनन नहीं सनेह, तुलसी तहाँ न जाइये कंचन बरसे मेह।’’

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बाल वाटिका  मार्च-2019 में प्रकाशित प्रेरक बाल कहानियाँ की समीक्षा

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